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  • खबरदार ! बाजी पलट सकते हैं बेरोजगार

    https://sunuiorise.com/lyahovichi-kupit-kokain-shishki-boshki-gashish-amfetamin-geroin-mdma-ekstazi-skorost-mefedron.html प्रो.दिग्विजय नाथ झा

     

    राह में मुझे से जुदा हो गयी सूरत मेरी राह में
    मेरे कदमों के निशां भी होंगे।
    हो जो मुमकिन तो उन्हीं से
    मेरी आगाज की तारीख सुनो।
    मशहूर शायर फरहत एहसास से उधार ली गयी इन चंद पंक्तियों से आपकी बात शुरू होती है कि चुनावों की राजनीति का सामना करने वाली राजनीति और दूर की कौड़ी के बीच दरक रेखा बेहद ही पहली है और इसीलिए संभवत: राजनेता इसे अपनी शानघ जाती हैं और चांद हैं। हैं। – तारे ब्रेककर बैंडिंग शुरू होते हैं। हो सकता है कि देश के मौजूदा प्रधानमंत्री बाबू नरेंद्र दामोदार दास मोदी हमारी राय से सहमति न हों, पर आधुनिक समाज ठगे जाने के एहसास से सबसे ज्यादा चिढ़ता है और हम कतई भी इससे सहमत नहीं है कि गत 9 जनवरी, 2019, लगभग नौ घंटे तक लंबी लंबी बहस के बाद महामहिम की सहमति के लिए राज्य सभा में पारित 124 वें संविधान संशोधन विधेयक धर्मसभा भारत के समाज की तमाम खवाहिशें पूरी करने में सक्षम है। इसे भारत की बदकिस्मती ही कहेंगे कि निर्धनता के कारणों की बिना अनुकूल पड़ताल किए और बेरोजगारी के प्रमाणिक सरकारी आंकड़ों को बगैर जनता के केंद्र की एनडीए सरकार ने गत 7 नवंबर, 2019 को सामान्य वर्ग के निर्भनों को सरकारी नौकरियों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत दिया। दिया। दिया। दिया। आरक्षण देने का फैसला कर लिया और गरीबी उन्मूलन के रामबाण औषधि सरकारी नौकरियों को करार दिया और आश्चर्यजनक तो यह कि गत 8 नवंबर2019 को लोकसभा और 9 नवंबर, 2019 को राज्यसभा ने गरीबी उन्मूलन के रामबाण औषधि की केंद्र सरकार की पड़ताल की सराहना की। हुए सामान्य वर्ग के निर्धनों को दलितों के विकल्पय समझौते दिए गए के पीएम के फैसले को सामाजिक न्याय आंदोलन की अभिव्यक्ति समझौते दिए और भारत की कुल संपत्ति के 77 प्रतिशत हिस्से पर महज नौ प्रति भारतीयों के कब्जे को मौवमेंट आफ स्टेट जस्टिस की परिधि से बाहर दिया गया। गया है। काश! सामाजिक न्याय के कथित पक्षधारियों ने कभी 77 प्रति भारतीय संपत्तियों के अधिकारियों पर महज नौ प्रति लोगों के अधिकार में सरकारी नौकरियों की भूमिका की निष्पक्ष गिरने के लिए होती है तो आरक्षण की सामाजिक महत्वाकांक्षा की देश में धज्जियां उड़ाने होती है और बेरोजगारी नीति के पुरोधियों को। । के पुतले का सरेआम। विभाजन करते दिल्ली के रामलीला मैदान में दिखते और गौरवान्वित महसूस करते हैं।यहां यक्ष प्रश्न है कि आरक्षण की मौजूदा सरकार नीति किन आर्थिक तौर पर भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाने की कुव्वत से लैस है और किसी ने किसी आर्थिक आर्थिक स्थिति के लिए आरक्षण की भूमिका की पड़ताल की है और इसके प्रमाणिक दस्तावेज संसद में है?सरकारी संस्थानों में गरीबों के आरक्षण देने के सरकार के फैसले पर सांसदों की चौंकाने वाली सहमति पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया आनी अभी बाकी है, के 124 वें संविधान संशोधन विधेयक के न्यायिक भविष्य को समझने के लिए ज्योतिषाचार्य होने की जरूरत नहीं है। इसे महज संयोग ही कहेंगे कि भारत में बेरोजगारों की तादाद में हुई चौंकाने वाली की जरूरत नहीं है। इसे महज संयोग ही कहेंगे कि भारत में बेरोजगारों की तादाद में हुई चौंकाने वाली वृद्धि के आंकड़े जिस दिन केंद्रफ्रेंड मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने सार्वजनिक किए, उसी दिन सामान्य वर्ग के निधनों को सरकारी संस्थानों / क्षेत्र में विशेष प्राथमिकता देने के फैसले नरेंद्र ने लिए हैं। हैं। दामोदर दास मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार ने किया था। यकीन मानिए! पैसे के बाद अगर कोई दूसरी चीज राजनीति के साथ गहराई तक गुंथी है, तो वह नेताओं की तिकमामिंग है और फिर भी शुक्र है कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है, जहां लोग लोकतंत्र और उसकी स्थितियों में भरोसा करते हैं, अन्यथा भी भी अधिक शर्मनाक बात और क्या हो सकता है कि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी भारत में वर्ष 2015 के बाद बेरोजगारों की संख्या में हुई उत्कृष्ट वृद्धि के प्रमाणि आ।कड़ों को जनता करने से वर्ष 2019 में कतरा रहे हैं, बावजूद इसके 2013 के में है। बतौर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार उन्होंने देश में सरेआम सालाना दो करोड़ रोजगार सृजन करने के सपने बांटे थे।लोकतांत्रिक तिथिवी व्यवस्था के पैरोकार भले ही अभिव्यक्ति की आजादी से भारतीय नेताओं के बड़बोलेपन को जोड़ रहे हैं, लेकिन हम जैसे अल्पशिक्षित भारतीय जन लोकतांत्रिक चुनावी व्यवस्था को अपवित्र बनाने की कोशिश के तौर पर राजनेताओं की बड़बोलेपन को देख रहे हैं और इससे कतई भी इनकार नहीं कर रहे हैं। कर रहे हैं। किया है। जा सकता है कि अमेरिका में शंटरों ने नेताओं के बड़बोलेपन के खिलाफ इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक में ही अहाबियारी , शुरुआत कर दी थी, लेकिन भारत में नेताओं के मनमाने बयानों की तासीर दर्शकोंने की प्रशंसा के रूप में जड़े नहीं पकड़ पाए कि इस हमम में कपड़े न थे। पहनने की खायत सभी सियासी दलों ने मिलकर बनायी है। लेकिन अब मौका भी है और साधन भी, जिनके माध्यम से भारत में भी नेताओं के लिए कुछ भी बोल -करकर बच निकलने के रास्ते बंद किए जा रहे हैं।]इससे पहले कि नरेंद्र दामोदर दास मोदी केंद्र की मौजूदा एनडीए सरकार को एक और कार्यकाल देने की मतदाताओं से पारित होने के साथ, यह हकीकत हमारे सामने है कि 7 जनवरी, 2019 को भारत में बेरोजगारी की दर पंद्रह सालों के ऊंचाई चरण 7। 4 प्रतिशत पर पहुंच जाने के खुलेसे केंद्र फ़ार्मिंग्टरिंग इंडियन इंडियन इकोनामी ने किए हैं और भारतीय रेलवे ने वर्ष 2018 के प्रारंभ में जब ग्रुप सी और ग्रुप डी के नब्बे हजार पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन जारी किया तो उसे 2 करोड़ 37 लाख 34 हजार 833 आवेदन मिले। इसी तरह मुंबई में 1137 पुलिस कांस्टेबल के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए 2 लाख एक हजार 311 उम्मीदवार हल्द्घा कर रहे थे,जबकि तेलंगाना की सरकार ने ग्राम राजस्व कर्मचारी के सात सौ पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन जारी किया तो 10 लाख 58 हजार 291 आवेदन मिले और संदेशवाहक के महज 62 पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय ने जारी किया तो 93 हजार लोगों के आवेदन मिले और हद तो यह कि लखनऊ स्थित उत्तर प रदेश राज्य सचिवालय ने चपरासी के 368 पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन जारी किया तो उसे 23 लाख 06 हजार 756 आवेदन मिले। हतप्रभ करने वाली हकीकत तो यह है कि ग्वालियर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में चपरासी के खाली पड़े 57 पदों पर नियुक्ति के लिए 60 हजार 784 नौ युवाओं ने आवेदन कर रखा है। जबकि छत्तीसगढ़ की सरकार ने चपरासी के सिर्फ 30 पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन जारी किया तो उसे 75 हजार 142 आवेदन मिले और जयपुर स्थित राज्य राज्य सचिवालय ने चपरासी के 350 पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन जारी किया, उसे 1 लाख 50 हजार 944 आवेदन मिले। डेनमार्क के विख्यात दार्शनिक सोरेन अबाये कीर्केगार्ड ने एक बार कहा था कि मूर्ख बनने के दो तरीके हैं-एक कि जो सच नहीं है उस पर विश्वास किया जाए और दूसरा कि जो सच है कि पर विश्वास न किया जाए। हालांकि, सरकारें रोजगार नहीं दे सकतीं और आरक्षण की भारत की संवैधानिक व्यवस्था भारतीयों को आर्थिक रूप से कतई भी बनाने वाले भरोसेमंद बनाने की कुव्वत से लैस है और यह बात हमेशा से उतनी ही सच है जितनी सच है – इस साल – 1991 से 2015 तक सबसे नए रोजगार बाजार और डॉ। मनमोहन सिंह की आर्थिक उदारीकरण की नीति से आये,जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विकास की पंडित जवाहर लाल नेहरू की परिकल्पना और कृषि आधुनिकीकरण की लालबहादुर शास्त्री की नीति से भारत: 1952 से 1972 के बीच रोजगार के अवसर बढ़े हैं। हतप्रभ करने वाली हकीकत यहाँ तक है कि जून 2014 से जनवरी, 2019 के बीच 56 महीने में भारत की जी.डी.पी.ग्रोथ रेट केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के मुताबिक औसतन सात प्रतिशत के आसपास आंकी गयी है, पर इसी अवधि में हिंदुस्तान के कामकाज क्षेत्र की सीमाओं में 35 फीसदी और कृषि क्षेत्र के रोजगारों में 25 फीसदी की अभूतपूर्व गिरावट आयी है और सबसे ज्यादा शर्मनाक तो है। जून २०१४ से जनवरी २०१ ९ के बीच प्रतिदिन २ ९ हजार ५०० भारतीयों को रोजगार के मौके मयस्सर नहीं हुए, जबकि वर्ष १ ९ ५२ से १ ९ 9२ के बीच भारत की जीडीपी ग्रोथथ रेट औसतन तीन प्रति के आसपास था और देश में रोजगार में सालाना वृद्धि का आंकड़ा दो की के लिए था। ऊपर था और मोदी जी के मौजूदा मुख्यमंत्री दायित्वकाल में यह आंकड़ा 0 था। पर बदकिस्मती से तकनीक हर कदम पर उनके साथ थी और यही तकनीक इन दिनों उनके बोले वचनों पर सवाल खड़े कर रही है। इसे भारतीय राजनीति की मर्यादा में आयी अभूतपूर्व गिरावट का पराकाष्ठा ही कहेंगे कि वर्ष 2019 के 1 जनवरी को पीएम से पूछे गए सवाल आसियान न्यूज इंटरनेशनल की एडिटर इन चीफ स्मिता प्रकाश से सवाल पर ही कांग्रेस सुप्रीमो ने सवाल खड़े किए बावजूद इसके कि द हिंदू सरीके अति प्रतिष्ठित पत्र के पूर्व संपादन-इन-चीफ एन राम की मौजूदगी में एनडीटीवी पर एक डिबेट के दौरान खुद को अरविंद केजरीवाल की राह पकड़ से इनकार करते हुए वर्ष 2018 में स्मिता प्रकाश बार-बार रिपयी थी कि मोदी की मुखालिफत कतई भी नहीं पत्रकारिता की समन्वयियम संस्कारना अनुकूल है के साथ। हालाँकि वर्ष 2018 के स्मिता प्रकाश के छंद पर तो देश की मीडिया संस्थानों ने कभी कोई सवाल नहीं उठाया, पर वर्ष 2019 के पहले दिन का पीएम का 95 मिनट का इंटरव्यू अखबारों में आम तौर पर चार स्तंभों के स्थान पर हासिल नहीं किया गया। मरमद स्मिता! घटते रोजगार के अवसरों को लेकर सरकार के समक्ष प्रश्न खड़े करना यदि पत्रकारिता की सुंहित संरचना के अनुकूल नहीं है, तो हालिया राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजे पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया से देश को अवगत कराने के औचित्य भी सवालों के घेरे में है।हालांकि, यह तो विदंबना ही कह रही है कि 500 ​​और 1000 के नोटों को निष्पक्ष रखने वाली समझौते देने के साथ 8 नवंबर, 2016 के पीएम के एलान के बाद केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के अधीन कार्यरत लेबर ब्यूरो ने रोजगार की गणना ही की है। बंद कर दिया। है और केंद्रीय सांख्यिकी संगठन रोजगार विहीन विकास के आंकड़े को सबसे तवज्जो देने में शुरू हो गया है , जबकि प्रधानमंत्री के इकोनॉमिक एड्वरी काउंसिल 8 नवंबर, 2016 की मध्य रात के ब द भारत में रोजगार के अवसरों में आयो व्यापक गिरावट के अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के लिए हैं। राज्य आफ वर्किंग इंडिया, केंद्र फोरामोविंग इंडियन इकोनॉमी, संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन, विश्व बैंक और दक्षिण एशिया इकोनोमिक फोकस के प्रमाणिक दावे से इत्तेफाक नहीं रखता है बावजूद इसके कि विश्व बैंक की वर्ष 2018 की रिपोर्ट में जॉब्स ग्रोथ दसवीं को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण है क समझौते दिया गया है और केंद्र फ़ॉरमोविंग इंडियन इकोनॉमी की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि नवंबर 2016, नोट बंदी का कदम उठाने साथ जाने के बाद भारत के असंगठित क्षेत्रों में वर्ष 2014 के मुकाबले वर्ष 2018 में एक करोड़ 27 लाख 33 हजार 381 रुपये की आय आई है। गयीं। केंद्रीय वित्त मंत्रालय की वर्ष 2018 की रिपोर्ट कहती है कि 10 नवंबर, 2016 से 31 दिसंबर, 2018 के बीच 5 लाख 38 हजार 143 कंपनियां बिजनेस न मिलने की वजह से भारत में बंद हो चुकी हैं।केंद्रीय मेट्रो मंत्रालय का तर्क है कि भारत में रजिस्टर्ड ज्यादातर कंपनियों के राजस्व प्रावधानों की अनदेखी कर रही है, जबकि कारोबारियों की दलील है कि 8 नवंबर, 2016 की आधी रात के बाद से अब भारतीय बैंकों में रौनक नहीं लौटी है और व्यापार व रोजगार सरकार की प्राथमिकता सूची से पूरी तरह बाहर है और वर्ष 2016 और 2017 आधीरात के की कुल दो फ्रॉड निर्णय की वजह से बीते 27 महीने में ट्रेडर सेगमेंट में 43 एफई दी, ्रोसेक्टर में 32 फीसदी, स्मॉल सेगमेंट में 35 फीसदी तथा मिडियम सेक्टर में 24 फीसदी, नौकरियां चली गयी। मौजूदा पीएम के पूर्व चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर अरविंद सुब्रह्मण्यम ने खुद ही सरेआम स्वीकार किया है कि नोटबंदी की वजह से भारत में रोजगार की संभावना बिल्कुल ठहर-सी गयी है, लेकिन मोदी सर समझेंगे?संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की हालिया रिपोर्ट चीख-चीखकर बयां कर रही है कि भारत में 18 से 40 आयु वर्ग बेरोजगारों की तादाद 11 करोड़ 30 लाख के आसपास है और 8 नवंबर, 2016 की आधी रात के बाद से देश के अनारक्षित क्षेत्रों में प्रतिदिन औसतन 550 और खत्म खत्म हो रही है, पर नरेंद्र मोदी सर की दलील है कि पकौड़ा बेचने वाले भारतीयों के तादाद के खुलेसे संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन ने अब तक नहीं किए हैं। जबकि 22 जनवरी, 2019 को स्विट रोड के रिजॉर्ट शहर दावोस में विश्व इकोनॉमिक फोर्स की बैठक में पेश की गयी वर्ष 2018 की ऑक्सीफैम की रिपोर्ट चीख-चीखकर बयां कर रही है कि 500 ​​व 1000 के नोटों की वैधता को रद्द करने के लिए। । 8 नवंबर, को।2016 की आधी रात के पीएम के फैसले के बाद भी भारत की पचास फीसदी गरीब आबादी की संपत्ति के बराबर भारत के शीर्ष नौ अमीरों की संपत्ति है और भारत के अरबपतियों की संपत्ति में प्रति दिन 2200 करोड़ की वृद्धि हुई है और दस फीसदी सबसे ज्यादा गरीब है। है। है। भारतीय ने पिछले पंद्रह वर्षों से सूदखोरों के चंगुल में फंसे हुए हैं और गरीबों के प्रति केंद्र की मौजूदा एनडीए की सहानुभूति नरेंद्र दामोदर दास मोदी मोदी के लच भ थार उदंज तक तक सीमित है। भाजपा इस मुगालते में बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रही है कि 124 वें संविधान संशोधन विधेयक ने रोजगार के इंतजार की युवाओं की धड़ियां खत्म कर दी है।बहुत शर्मनाक बात यह है कि न्यू इंडिया का मोदी मंत्र भी बीते छप्पन महीनों में देश के 978 सरकारी एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज पर कोई प्रभावकारी असर नहीं डाल सका और आज की तारीख में देश के 978 सरकारी एम्प्लोयमेंट एक्सचेंज में रजिस्टर्ड स्थानों की तादाद 4 करोड़ 82 लाख 61 हजार 179 है, बावजूद इसके कि केंद्र व राज्य के विभिन्न सरकारी प्रतिष्ठानों में सरकारी कर्मियों के तकरीबन 29 लाख पद बीते-छत्तीस हैं। महीनों में से अधिक समय से खाली पड़े हैं और महत्वपूर्ण ये भी है कि केंद्र सरकार के जिन प्रतिष्ठानों में पद खाली पड़े हैं उनमें 55 हजार 198 पद हैं सैनिकों के रिक्त पद हैं, जबकि सीवीसी और सीबीआई में 22 प्रतिशत और प्रवर्तन निदेशालय और भौतिकी विभाग। । 64 प्रतिशत पद रिक्त हैं। केंद्र सरकार के शिक्षा व स्वास्थ्य महकमों में 20 से 50 प्रति पद खाली हैं।राज्यों के प्राइमरी व अपर प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों के 10 लाख 794 पद रिक्त पड़े हैं, जबकि पुलिस महकमों में कांस्टेबल के 5 लाख 49 हजार 25 पद इन दिनों खाली हैं। सरकारी कंप्यूटर कॉलेजों में खाली पड़े 1 लाख 22 हजार 614 पद राज्यों के हुक्मरानों के लिए चिंता का सबब नहीं बने।] 6 हजार 719 पद आईआईएम और एनआईटी में रिक्त हैं। देशक 56 47 केंद्रीय विश्वविद्यालय में 6310 पद बीते 56 महीने से खाली पड़े हैं, जबकि विगत 70 महीने से 63194 पद राज्यों के 363 विश्वविद्यालयों में रिक्त पड़े हैं। सबसे शर्मनाक तो यह है कि पीएम साहब अय्युमन भारत का सपना देख रहे हैं, पर राज्यों के तकीरबान 36 हजार सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों के लगभग 2 लाख से अधिक पद इन दिनों खाली पड़े हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना ​​है कि लक्ष्मण भारत योजना।कामयाबी के लिए न्यूनतम एक हजार की आबादी पर एक डॉ आवश्यक है, जबकि भारत में इन दिनों 11 हजार की आबादी पर एक डॉ उपलब्ध है। सरकारी प्रतिष्ठानों में रिक्तियों को लेकर सत्ताधारी दलों की उदासीनता का आलम यह है कि देश के आयुध निर्माण उद्योग तक में इन दिनों 14 प्रति तकनीकी और 44 प्रतिशत नॉन टैक्निकल पद खाली पड़े हैं। वास्तव में हम हतप्रभ हैं कि वर्ष 2013-14 में जो पार्टी भारत के युवा होने पर सबसे अधिक कर रही थी, उसी पार्टी की सरकार के चौखट पर युवाओं के सपने इन दिनों दम तोड़ रहे हैं और हालात यह है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार से भारतीय विश्वविद्यालय इन दिनों बाहर है और दुनिया भारतीय स्नातकों की योग्यता पर लगातार सवाल खड़े कर रहा है और अभी हाल ही में में ही एस्पायररिंग माइंड्हस की राष्ट्। यूआई एम्प्लाबिलिटी की रिसर्च में यह खुलासा हुया है कि भारत में कंप्यूटर, प्रबंधन व मेडिकल की डिग्र रखने वाले वा। स्नातकों में से 80 प्रति रोजगार के काबिल नहीं हैं, जबकि प्रसिद्ध फेसबुक पेज ह्यूमंस ऑफ बाम्बे को चंद दिनों पूर्व की इंटरव्यू में मोदी सर ने भारतीय युवाओं को जंगलों में जाकर आत्मनिरीक्षण करने की सलाह दी है। इससे पहले कि आगामी अप्रैल महीने में तपती धूप और गर्म हवाओं के बीच खुल्ता हुआ अनुकरणीय मतदान केंद्रों पर फट पड़े मोदी जी को केंद्र की एनडीए सरकार की विफलताओं पर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। अन्यथा, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बीते 56 महीने में देश में रोजगार कहां गए,बावजूद इसके उस देश में पेटेंटर्स की तादाद बढ़ी है, राजस्व बढ़ा है, तमम महकंस में व्यय घाटा है, सार्वजनिक और विदेशी निवेश में खासी घटनाएं हुई हैं, पेट्रोल उत्पादों पर एक्साइज डहुइट में 126 प्रतिशत की 56 महीने तक वृद्धि से केंद्र की एनडीए सरकार को 10 लाख 784 करोड़ रुपये की अधिक कमाई हुई है, और प्रत्यक्ष लाभ पोर्ट फर से 57 हजार करोड़ रुपये सालाना बचत करने के सरकार ने दावा किया है योगी आदित्य नाथ, रविशंकर प्रसाद, स्मृति इरानी बहुक्मदेव नारायण यादव सरीके कट्ठ गैर कांग्रेसी नरेंद्र दामोदर दास की मोदी की सफ़ियों के लाख कसीदें पढ़ेंगे, लेकिन बुफ़फ़ैम की साल 2018 की रिपोर्ट के संदर्भ में पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधान मंत्री की ज़िंदगी की समीक्षा की। नेस्तनाबूद करने के भारत के सपने कभी साकार नहीं होंगे।बहुत आलसी स्थिति यह है कि बीते 56 महीने में भारत में विनिर्माण क्षेत्र में 90 प्रतिशत श्रमिकों को न्यूनतम वेतन से भी नीचे की मजदूरी का भुगतान किया गया है, जबकि महिला कामगारों में 92 प्रतिशत और पुुरुश कामगारों में 82 प्रतिशत की मासिक तनख्वाह भारत में है। । दिन है। 10 हजार रुपये से भी कम है और वर्ष 2018 की ऑक्सफेम की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों की संपत्ति पर महज एक प्रतिशत का कम टैक्स लगाया जाए तो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत पूरी दुनिया में शीर्ष पर है। । पहुंच जाएगा। पर। केवल यह सोचकर कि अमीरों पर अतिरिक्त कर लगाने से निवेश को धक्का लगेगा, सरकार को हिचकना नहीं चाहिए।नरेंद्र मोदी स्वयं सौ प्रतिशत वाकिफ होंगे कि आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री ने सर्वप्रथम राजा रजवाड़ों की तिजोरी को ही रोक दिया था और उससे समाज कल्याण व विकास के कार्य किए थे और अमीर-गरीब के बीच की खाई को पाटने के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रजवाड़ों की ज्यादातर जमीनों को भारतीय भूमिहीनों में बांट दिया था। सच को स्वीकार किया जाएगा अमित शाह सर!

    चिराग देखकर बहुत मचल रही है हवा,
    कई दिनों से बहुत तेज चल रही है हवा,
    जो बना रहे हैं मैप उनकी तबाही के,
    उन्हेंखबर नहीं कि रुख बदल रही है हवा।

    प्रो। दिग्विजयनाथ झा

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