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  • नीतीश गवर्नेंस : संकट में शिकायतों की साख

    भागलपुर जिला निवासी चार्टर्ड अकाउंटेंट संजीत कुमार समेत रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान और बिहार विधानसभा के सम्मानित सदस्यों की शिकायतों की साख की मुख्यमंत्री के नाक के नीचे अभी हाल ही में हुई सरेआम नीलामी के बाद मुझे तो बिल्कुल भी नहीं लगता कि जनशिकायतों के निष्पादन के प्रति नीतीश कुमार की व्यक्तिगत मंशा नेक है और बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता की उनकी नीति की अभिव्यक्ति है। हम 2019 के सपने देखने की मनाही तो नीतीश कुमार को कतई भी नहीं कर सकते, परंतु मुश्किल यह है कि वर्ष 2009 के मुकाबले 2019 में निकम्मे नौकरशाहों के प्रति नीतीश कुमार की निष्ठा पर सवाल खड़े करने वालों की तादाद बिहार में बेतहाशा बढ़ी है और बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के औचित्य एवं इसकी सार्थकता पर बहस जारी है तथा नौजवानों से लेकर बुढ़ों तक के अपने-अपने तर्क हैं, बावजूद इसके कि सबके सब इससे सहमत हैं कि बिहार के तमाम बड़े प्रशासनिक ओहदों पर निकम्मे नौकरशाहों के बरकरार रहते बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनितयम, 2015 भी सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 व बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 की तरह कभी नहीं भ्रष्टाचार पर असरदार नियंत्रण का मजबूत हथियार बन सकेगा? बेशक, इससे इनकार नहीं किया जा  सकता है कि बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 उस बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 की प्रासंगिकता को सिरे से खारिज करती है, जिसे कि बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2011 के आखिरी महीने में संवैधानिक प्रावधानों के भीतर भ्रष्टाचार पर असरदार नियंत्रण का कारगर हथियार करार दिया था। हम तो हतप्रभ है कि सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के विनाशकारी कारनामे के खिलाफ 07 अगस्त, 2017 को बिहार में मचे घमासान के पंद्रह दिनों बाद माननीय मुख्यमंत्री ने अंततः यह स्वीकार किया कि सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के गैर कानूनी कृत्यों में संलिप्तता की भागलपुर निवासी चार्टर्ड अकाउंटेंट संजीत कुमार की 25 जुलाई, 2013 की लिखित शिकायत सक्षम विभागीय पदाधिकारी को प्रतिक्रिया के लिए भेजी गयी थी, पर उन्होंने यह खुलासा अब तक नहीं किया है कि अवैध बैंकिंग कारोबार में सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड की संलिप्तता की जांच के 09 सितंबर, 2013 के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के निर्देशों की अनदेखी के पीछे सरकार की मंशा क्या थी? मुझे यहां फिराक जलालपुरी की एक शेर याद आ रही है कि,
    तू इधर-उधर की बात न कर ये बता कि काफिला क्यूं लुटा,
    मुझे रहजनों से गिला नहीं तेरी रहबरी का सवाल है।
    खुद को भ्रष्टाचार उन्मूलन के प्रबल हिमायती होने का दावा करने वाले नीतीश कुमार ने कभी किसी सार्वजनिक मंचों पर इसकी व्याख्या नहीं की कि बिहार सरकार के एक वरिष्ठ राजपत्रित अधिकारी जयश्री ठाकुर के सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के खाते से बिहार सरकार की आर्थिक अपराध इकाई ने वर्ष 2013 में सात करोड़ बत्तीस लाख रुपये जब्त किये थे, बावजूद इसके कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने सेवा से उनकी बर्खास्तगी की पहल बिल्कुल भी नहीं की और 13 जुलाई, 2013 को आखिरकार सामान्य प्रशासन विभाग के तत्कालीन प्रधान सचिव को सरेआम यह बात कहनी पड़ी कि सेवा से जयश्री ठाकुर की बर्खास्तगी बगैर मुख्यमंत्री की अनुमति के कतई भी संभव नहीं है। सर्वाधिक शर्मनाक तो यह कि सरकारी रकम को विभागीय खातों के बजाय सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के छह अलग-अलग खातों में डिपोजिट करने के कोषागार कर्मियों के कुकृत्यों के भागलपुर के जिलाधिकारी आदेश तितरमारे के 07 अगस्त, 2017 के खुलासे के महज चंद महीनों बाद ही माननीय मुख्यमंत्री ने भागलपुर के जिलाधिकारी पद से आदेश तितरमारे की छुट्टी कर दी और उनकी जगह भागलपुर के जिलाधिकारी पद पर अपने चहेते जिस आईएएस अधिकारी की नियुक्ति नीतीश ने की उनकी एक मात्र बहुचर्चित उपलब्धि यही है कि गैर कानूनी कृत्यों में समस्तीपुर सदर अंचल कर्मियों की संलिप्तता की साक्ष्यों पर आधारित 22 जुलाई, 2011 के अपर समाहर्त्ता के लिखित शिकायतों को ही बतौर जिलाधीश उन्होंने 31 अगस्त, 2017 को गैर कानूनी करार दिया था और ऐसी भी बात नहीं कि सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के गैर कानूनी कृत्यों के खुलासे मामले में जिलाधिकारी पद से आदेश तितरमारे की छुट्टी नीतीश के मुख्यमंत्रित्व काल की कोई पहली घटना है। वर्ष 2013 में भी सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के विनाशकारी कारनामे की जांच के हिमायती आईएएस अधिकारी की भागलपुर के जिलाधिकारी पद से नीतीश ने छुट्टी कर दी थी और अपने चहेते एडीएम स्तर के अधिकारी जयश्री ठाकुर के कुशल निर्देशन में 9 सितंबर, 2013 के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भागलपुर जिले के विभिन्न विभागीय खातों से सरकारी राशि की अवैध निकासी की खुली छूट सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड को दे दी थी। सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के गैर कानूनी कृत्यों को दबाने की मुख्यमंत्री सचिवालय की साजिश को हरसंभव नाकाम करने की कोशिश में अब तक जुटे चार्टर्ड अकाउंटेंट संजीत कुमार के दावे पर यदि यकीन करें तो सिर्फ व सिर्फ नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्वकाल में सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के आपत्तिजनक कारनामे की वजह से बिहार को बारह सौ करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। बहरहाल, 4 अगस्त, 2016 को बिहार मद्य निषेध व उत्पाद अधिनिमयम, 2016 बिहार विधानमंडल में पारित होने के बाद जश्न में डूबी महिलाओं की तादाद के कोई प्रमाणिक आंकड़े तो नीतीश कुमार की सरकार ने कभी सार्वजनिक नहीं किये हैं, परंतु नौ लाख लीटर से अधिक शराब चूहे के गटक जाने के बिहार पुलिस पदाधिकारियों के खुलासे ने जहां राज्य में अवैध शराब कारोबारियों के हौसले को नयी उड़ान दी है, वहीं 2007 बैच के बिहार काडर के आईपीएस अधिकारी के अवैध शराब कारोबारियों से अपवित्र रिश्ते के प्रमाणिक दस्तावेज ने स्पेशल विजिलेंस के पुलिस महानिरीक्षक बाबू रत्न संजय के पसीने छुड़ा दिये हैं, जबकि पटना स्थित राज्य पुलिस मुख्यालय के आंकड़े चीख-चीख कर बयां कर रहे हैं कि बिहार मद्य निषेध व उत्पाद अधिनियम, 2016 बिहार विधानमंडल में पारित होने के बाद राज्य में प्रत्येक दिन महिलाओं के साथ बलात्कार की तीन से ज्यादा घटनाएं हो रही है और हर रोज महिलाओं के अपहरण के 18 से अधिक मामले पुलिस थानों में दर्ज हो रहे हैं। 1 जनवरी, 2017 से 30 जून, 2018 के बीच बिहार के पुलिस थानों में महिला अपराध से जुड़े बलात्कार के 1881, अपहरण के 9207, दहेज हत्या के 1656, दहेज प्रताड़ना के 6408, छेड़खानी के 2704 एवं अन्य अमानवीय उत्पीड़न के 4894 मामले दर्ज हुए हैं, बावजूद इसके कि इसी अवधि में बिहार मद्य निषेध व उत्पाद अधिनियम, 2016 के सुसंगत प्रावधानों के तहत कुल 62123 मामले भी राज्य के पुलिस थानों में दर्ज हुए और 92111 लोगों की गिरफ्तारियां भी हुई तथा 32 पुलिसकर्मियों की नौकरियां तक खत्म हो गयी, पर शराबबंदी के नशे में मद होश नीतीश सरकार शेल्टर होम्स के खिलाफ टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की 96 पृष्ठों की शिकायतों को नौ महीने में नहीं पढ़ सकी और अंततः सुप्रीम कोर्ट को टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ सोशल साइंसेज की फरवरी 2018 की रिपोर्ट को गहन अध्ययन करने की सलाह सीबीआई को 28 नवंबर, 2018 को देनी पड़ी। शेल्टर होम्स में बच्चों से यौन शोषण मामले की बिहार पुलिस की जांच पर हैरानी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी लाकुर की अध्यक्षता वाली जस्टिस दीपक गुप्ता व जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने 27 नवंबर, 2018 को शीर्ष अदालत में उपस्थित बिहार के मुख्य सचिव से पूछा कि क्यों बिहार की पुलिस बच्चों के साथ दुष्कर्म के मामले को धारा 377 के तहत दर्ज करने से कतरा रही है, जबकि टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट को हम जब भी देखते है तो बच्चों के साथ हुए बर्ताव को पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और ये शर्मनाक है कि बिहार की पुलिस केवल मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले की तहकीकात ही कर रही है, बावजूद इसके कि टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट में बिहार के 17 शेल्टर होम्स में बच्चों के साथ दुष्कर्म किये जाने की बात कही गयी थी। परंतु डूब मरने की बात है कि 27 नवंबर, 2018 को देश की शीर्ष अदालत के समक्ष बिहार के मुख्य सचिव ने स्वयं खुलासा किया कि बिहार के 17 शेल्टर होम्स के खिलाफ टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की 96 पृष्ठों की आपत्तिजनक रिपोर्ट को हमने अभी तक पढ़ा नहीं है। अफसोस! टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ सोशल साइंसेज की शिकायतों को संज्ञान में लेकर बिहार के अधिकारियों ने कभी सख्त कार्रवाई की होती तो देश की शीर्ष अदालत कतई भी नहीं बिहार सरकार के एडवोकेट को आड़े हाथों लेते हुए यह तल्ख टिप्पणी करती कि बिहार की सरकार दुष्कर्मियों की संरक्षक है। मसलन, बिहार के मुख्यमंत्री तो दावा करते हैं कि बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के तहत जनशिकायतों को ऑनलाइन रजिस्टर्ड करने की सुविधा प्रशासनिक सुधार की दिशा में अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध हो रही है, जबकि नीतीश कुमार के बेहद करीबी बिहार विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने सरेआम शिकायत की है कि राज्य के अधिकारियों ने ऑनलाइन भेजे गये 310 सवालों में से किसी एक का भी जवाब विधानसभा सचिवालय को नहीं दिया और इसी मसले पर बिहार विधानसभा सचिवालय ने अभी हाल ही में जब संबंधित विभागीय अधिकारियों की बैठक बुलायी तो कई अधिकारियों ने शामिल होने से ही इनकार कर दिया। बिहार विधानसभा अध्यक्ष के दावे पर अगर यकीन करें तो विधानसभा सचिवालय ने बिहार सरकार के आठ विभागों यथा, ग्रामीण कार्य, शिक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, अपदा प्रबंधन, लघु, सिंचाई, कला संस्कृति युवा तथा जल संसाधन विभाग को क्रमशः 84, 68,30,61,20, 12, 11 एवं 24 सवाल ऑनलाइन भेजे, पर किसी एक सवाल का जवाब भी विधानसभा सचिवालय को नहीं मिला और कुछ इसी तरह के खुलासे 16 अगस्त, 2018 को समस्तीपुर जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी ने भी किये हैं। बिहार राज्य लोक शिकायत प्राप्ति केंद्र को ऑनलाइन भेजे गये अपनी शिकायत में समस्तीपुर जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी ने साफ-साफ उल्लेख किया है कि लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के सुसंगत प्रावधानों के तहत उनकी शिकायतों को समस्तीपुर जिला भू-राजस्व पदाधिकारी संज्ञान में नहीं लेते। महज राजद व कांग्रेस से जनता दल (यू) के रिश्ते तोड़ लेने का मतलब यह नहीं है कि बिहार के भ्रष्ट व निकम्मे नौकरशाहों के बूरे दिन आ गये हैं, अन्यथा आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाक के नीचे राजधानी पटना स्थित दुल्हिन बाजार अंचल कार्यालय में निलंबित अंचल पदाधिकारी साकेत भूषण सिंह लगातार तीन महीने तक सामान्य रूप से सरकारी कामकाज निबटाते रहे और बिहार राज्य भू राजस्व विभाग के बड़े अधिकारियों को इसकी खबर तक नहीं लगी, जबकि सीबीआई के करप्शन ब्रांच ने साढ़े चार करोड़ के कृषि अनुदान राशि की लूट का उन्हें गुनाहगार करार दिया था और इसी आधार पर 13 नवंबर, 2013 को राज्य सरकार ने साकेत भूषण सिंह को सेवा से निलंबित कर दिया था। भ्रष्टाचारियों के प्रति नीतीश सरकार की निष्ठा का आलम यह है कि बीते तेरह सालों में बिहार राज्य निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने भ्रष्टाचार में सरकारी कर्मियों की संलिप्तता के खिलाफ तकरीबन एक हजार से अधिक मामले दर्ज किये हैं, पर सेवा से बर्खास्तगी सौ से ज्यादा सरकारी कर्मियों की नहीं हुई है और ऐसा इसलिए कि अदालत परिसर में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की शिकायतों की साख के प्रति सरकार की मंशा नेक नहीं है तथा लोकसेवक सेवा नियमावली के प्रावधानों के मुताबिक बगैर न्यायालय की अनुमति के भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपित सरकारी कर्मियों की सेवा से बर्खास्तगी कानूनन वैद्य नहीं है। सच पूछिए तोे नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्वकाल में जनशिकायतों पर अंकुश लगाने के मकसद से बिहार विधानमंडल में पारित सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005, बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 एवं बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 प्रशासनिक सुधारों की विसंगति तथा दिखावटी गवर्नेंस का शिकार हो गया है। बिहार सरकार का शायद ही कोई ऐसा महकमा हो जहां के एक-दो कर्मचारी या अधिकारी बीते तेरह सालों में भ्रष्टाचार के खिलाफ विजिलेंस की मुहिम में रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार नहीं किये गये हों। कोई माने अथवा नहीं माने किंतु बिहार के 17 शेल्टर होम्स में बच्चों के साथ दुष्कर्म मामले में राज्य की मौजूदा सरकार को लगी सुप्रीम कोर्ट की फटकार, सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के शर्मनाक कारनामे और केंद्रीय राज्यमंत्री गिरि राज सिंह एवं अश्विनी कुमार चौबे के निरंतर जहरीले बयान नीतीश के उसदावे की सरेआम धज्जियां उड़ाते दिख रही है कि जनता दल (यू) के नेतृत्ववाली बिहार की राजग सरकार क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से कतई भी नहीं कॉम्प्रोमाइज कर सकती है। यद्यपि, दर्द कहीं एक जगह हो तो कहें यहां…! बीते तेरह सालों में भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण के लिए बिहार विधानमंडल में विधेयकों को पारित कराने के अलावा नीतीश कुमार की सरकार और राज्य के नौकरशाहों ने इस बात में और कोई कसर नहीं छोड़ी है कि एक दूसरे के खिलाफ उनकी अदालत साफ-साफ दिख जाए। इसे निरंकुश नौकरशाही की हद ही कहेंगे कि समस्तीपुर के अपर समाहर्ता दरभंगा आयुक्त कार्यालय की शिकायतों पर संज्ञान नहीं लेते और नवादा के जिलाधिकारी समाहरणालय परिसर में स्थानीय पत्रकारों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा देते तथा बिहार राजग के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय राज्यमंत्री गिरिराज सिंह सरेआम पत्रकारों को प्रशासन से पंगा नहीं लेने की सलाह देते हैं, जबकि आज की तारीख में निरंकुश नौकरशाही के मुद्दे बिहार में राजद व कांग्रेस से अधिक असरदार विपक्ष की भूमिका निभाते दिख रहे हैं। गत 4 अगस्त, 2015 को सर्वसम्मति से बिहार विधानसभा में पारित बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के सुसंगत प्रावधानों के तहत जनशिकायतों के निष्पादन नहीं करने की जिद ठाने बैठे अधिकारियों ने तो बिहार की एनडीए सरकार का जैसे इकबाल ही खत्म कर दिया है और अभी कुछ महीने पहले ही यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस एवं लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स सरीखे दुनिया के तीन सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में भारत की नौकरशाही और भ्रष्टाचार पर किये गये शोध में यह खुलासा हुआ है कि बिहार की नौकरशाही अन्य भारतीय राज्यों के मुकाबले बहुत ज्यादा भ्रष्ट हैं, पर नीतीश बाबू इस खुशफहमी है कि बीते दो सालों में बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के सुसंगत प्रावधानों के अंतर्गत आम लोगों की फरियाद नहीं सुनने वाले राज्य के 254 अधिकारियों से सरकार ने 7 लाख 52 हजार रुपये जुर्माने वसूले हैं। हालांकि, नीतीश कुमार की यह खुशफहमी ही उनकी गलतफहमी है, क्योंकि बिहार की जनता इससे अक्षरशः वाकिफ है कि सीएम के बेहद करीबी मुख्य सूचना आयुक्त अशोक कुमार सिन्हा ने प्रशासनिक पारदर्शिता की पर्याय सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को राज्य में निष्प्रभावी बनाने में कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी है। बिहार राज्य निगरानी अन्वेषण ब्यूरो का दावा है कि पुलिसकर्मियों और भू-राजस्वकर्मियों के आपत्तिजनक कारनामों ने बिहार की नौकरशाही को सर्वाधिक बदनाम कर  रखा है और रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गये सरकारी कर्मियों की फेहरिस्त में पुलिसकर्मियों व भू-राजस्वकर्मियों के आंकड़े सर्वाधिक शर्मनाक है, किंतु ताज्जुब है कि नीतीश कभी सार्वजनिक मंचों से यह स्वीकार नहीं करते कि पुलिसकर्मियों व भू-राजस्वकर्मियों की काली कमाई में सचिवालयों की भी हिस्सेदारी है, वह तो महज इतना ही स्वीकार करते हैं कि बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के सुसंगत प्रावधानों के तहत सर्वाधिक 24 हजार शिकायतें राजस्व व भूमि सुधार विभाग के खिलाफ आम लोगों ने ऑनलाइन रजिस्टर्ड करायी है। सच पूछिए तो ऐसा लग रहा है कि जैसे बिहार के नौकरशाहों ने आमजनों की संवेदनशीलता को समाप्त करने की सुपारी उठा ली हो और नीतीश कुमार के नेतृत्वाली जद (यू) भाजपा की सरकार बहुत ही सिलसिलेवार तरीके से उस सुपारी उठाने वाले की तरतीब को पकड़े बिना उसी के बताये रास्ते पर आंखें मूंद कर गर्दन हिलाते हुए चल रही हो। पूरे प्रदेश में जिस तरह का प्रशासनिक माहौल निकम्मे नौकरशाहों ने सरकारी दफ्तरों के भीतर बनाकर रख दिया है उसका एक ही सबब नजर आ रहा है कि सरकारी महकमे को अब ढोल मंजीरा लेकर कीर्तन करने वाले ऐसे लोगों की भजन मंडली साबित कर दिया जाना चाहिए, जिनका एकमात्र लक्ष्य भ्रष्टाचार का महिमामंडन करना हो। हम तो सुशासन सुप्रीमो से ससम्मान महज इतना ही पूछना चाहते हैं कि सीएम सचिवालय के बेहद करीबी अधिकारियों को सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के खिलाफ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की शिकायतों पर संज्ञान लेने में लगभग चार वर्ष क्यों लगे? टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की 96 पृष्ठों की धमाकेदार ऑडिट रिपोर्ट को पढ़ने में बिहार के मुखय सचिव को नौ महीने क्यों लगे? दरभंगा प्रमंडलीय आयुक्त के सचिव के 02 नवंबर, 2017 के 87 पृष्ठों की शिकायतों को पढ़ने में समस्तीपुर के जिलाधिकारी को कितने वर्ष लगेंगे? भ्रष्टाचार के खिलाफ विजिलेंस की मुहिम में पकड़े गये अधिकारियों की राज्य के बड़े ओहदे पर पुनः हुई नियुक्ति के क्या वजह है? किन कारणों से बिहार में राजस्व व भूमि सुधार विभाग के खिलाफ जनशिकायतों की फेहरिस्त लंबी है? आज सवाल लालू-राबड़ी राज की गलतियों के विश्लेषण का नहीं है वरना वर्ष 2015 में राज्य के 23 वें मुख्यमंत्री जीवन राम मांझी के इस्तीफे की वजहों का भी पोस्टमार्टम करना पड़ेगा। आज सवाल आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी बिहार की नौकरशाही को लेकर नीतीश सरकार की मरणासन्न स्थिति के विश्लेषण का है और इससे कतई भी नहीं इनकार किया जा सकता है कि बिहार के शेल्टर होम्स और राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की त्रासद हकीकत को सामने आये लगभग नौ और छह महीने हो गये हैं, लेकिन हैरानी की बात है कि बिहार सरकार की ओर से कोई सख्त कार्रवाई अब तक प्रारंभ नहीं हुई है बावजूद इसके कि टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की 96 पृष्ठों की ऑडिट रिपोर्ट में साफ-साफ उल्लेख किया गया है कि राज्य में सरकारी मदद से चलायी जा रही कुल 110 शेल्टर होम्स में से 102 शेल्टर होम्स बिल्कुल ही नरक के समान है तथा बिहार सरकार द्वारा आवंटित राशियों का दस फीसदी भी नरक के पर्याय बने शेल्टर होम्स में बच्चों के लिए खर्च नहीं किया जा रहा है, जबकि बिहार राज्य निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने राज्य के राजस्व व भूमि सुधार विभाग के भू-नामांतरण की प्रक्रिया को भ्रष्टाचार का पर्याय बताते हुए राज्य के अंचल पदाधिकारी के दफ्तरों को पुलिस थानों के समान सर्वाधिक भ्रष्ट करार दिया है और इस पर अपनी निगाह रखने की नयी रणनीति तैयार की है तथा अलग सेल के गठन करने का फैसला लिया है, पर सीएम सचिवालय अब भी खामोश है और बिहार की बड़ी आबादी आक्रोशित है।

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