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  • सूरत बदलने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं

    https://sweeimtheart.com/ferrara-zakladki-mef-fen-geroin-kokain-gashish-shishki-boshki-mdma-ekstazi-metadon.html प्रो. दिग्विजयनाथ झा

    इस मुगालते में मत रहिए की सीबीआई की साख कब लौटेगी! सीबीआई निदेशक के निश्चित कार्यकाल की अनदेखी मामले की 16 नवंबर, 2018 को पूर्व जस्टिस एके पटनायक की निगरानी में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गयी सीवीसी की जांच रिपोर्ट में 23 अक्तूबर, 2018 की आधी रात को लंबी छुट्टी पर भेजे गये सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को क्लीन चीट नहीं दी गयी है, बावजूद इसके सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली जस्टिस एसके कौल एवं जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच के 16 नवंबर, 2018 के निर्देशों की अनदेखी की और पूर्व जस्टिस एके पटनायक की निगरानी में 16 नवंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गयी केंद्रीय सतर्कता आयोग की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक तौर पर आपत्ति करार देने के बाद 19 नवंबर, 2018 को सीवीसी के सवालों का जवाब सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सील बंद लिफाफे में सौंपी और इस बीच 16 नवंबर, 2018 को आंध्र प्रदेश एवं 17 नवंबर, 2018 को पश्चिम बंगाल की सरकारों ने दिल्ली पुलिस स्पेशल स्टेबलिशमेंट एक्ट, 1946 की धारा-6 के तहत सीबीआई को शक्तियों के इस्तेमाल के लिए दी गयी सामान्य रजामंदी वापस ले ली है तथा प्रांतीय सरकार के बगैर अनुमति के आंध्र प्रदेश व पश्चिम बंगाल में सीबीआई की सीधी दखलंदाजी पर पाबंदी लगा दी है। तत्पश्चात 18 नवंबर, 2018 को अपराह्न एक बजे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बगैर प्रांतीय सरकार की अनुमति के राज्यों में सीबीआई के प्रवेश पर प्रतिबंध के आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के फैसले का तहे दिल से स्वागत किया है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी सीबीआई में मचे घमासान पर अपना मुंह खोलने से अब तक बच रहे हैं, लेकिन सीधे पीएमओ के तहत काम करने वाली एजेंसी में हालात ऐसे बिगड़ जाएं तो पीएम की मंशा और पीएमओ की प्रशासकीय क्षमता पर तो सवाल खड़े होते ही हैं। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि 23 अक्तूबर, 2018 की आधी रात को सीबीआई के कार्यकारी निदेशक पद पर हुई अपनी नियुक्ति के महज बारह घंटे के भीतर ही दिल्ली हाईकोर्ट के आदेशों की अनदेखी करते हुए सीबीआई के कार्यकारी निदेशक एम नागेश्वर राव ने 23 अक्तूबर, 2018 की आधी रात को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की सिफारिश पर लंबी छुट्टी पर भेजे गये सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना की भ्रष्टाचार में संलिप्तता की तहकीकात कर रहे सीबीआई के पुलिस उप महानिरीक्षक मनीष कुमार सिन्हा व पुलिस उपाधीक्षक एके बस्सी के तबादले कर दिये, जबकि स्वयं राकेश अस्थानाने 23 अक्तूबर, 2018 को अपराह्न एक बजे से पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में खुद पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर दर्ज की गयी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) को निरस्त करने की मांग की थी, पर दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार में राकेश अस्थाना की संलिप्तता के मांस निर्यातक मोइन कुरैशी के करीबी मीट कारोबारी सना सतीश बाबू के आरोपों की सीबीआई जांच में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए यथास्थिति कायम रखने के आदेश दिये थे। बेशक, खुद पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की जिम्मेदारी बेंगलुरू स्थित सीबीआई की बैंकिंग व विनिमय फ्रॉड इकाई को सौंपे जाने के छुट्टी पर भेजे गये सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के फैसले से 1986 बैच के ओडिशा कैडर के आईपीएस अधिकारी एम नागेश्वर राव खफा हो सकते हैं, लेकिन यह सवाल तो पूछे ही जा सकते हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देशों की अनदेखी के 24 अक्तूबर, 2018 के सीबीआई के कार्यकारी निदेशक के फैसले के बाढ़ भ्रष्टाचार के आरोपों में आकंठ डूबी सीबीआई आखिरकार कब उबरेगी और दून स्कूल में पढ़े विवादास्पद मीट एक्सपोर्टरमोइन अख्तर कुरैशी से पूर्व सीबीआई निदेशक अमर प्रताप सिंह व रंजीत सिन्हा के प्रगाढ़ संबंध तथा शेल कंपनियों व भू-माफियाओं से एम नागेश्वर राव के मधुर रिश्ते की हुई सीबीआई जांच के नतीजे आखिर कब तक सार्वजनिक होंगे? वर्तमान सीबीआई प्रकरण में कई नये खुलासे होने तो अभी बाकी है, पर नयी दिल्ली से अंडमान निकोबार तबादले के 24 अक्तूबर, 2018 के सीबीआई के कार्यकारी निदेशक एम नागेश्वर राव के आदेश के खिलाफ 30 अक्तूबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी अर्जी में राकेश अस्थाना के विरुद्ध मीट कारोबारी सना सतीश बाबू के आरोपों की तहकीकात कर रहे आईओएके बस्सी ने जहां खुलासा किया है कि उनकी जांच में राकेश अस्थाना के खिलाफ बेहद ही अकाट्य संगीन साक्ष्य मिले हैं, वहीं 19 नवंबर, 2018 को नयी दिल्ली से नागपुर तबादले के 24 अक्तूबर, 2008 के सीबीआई के कार्यकारी निदेशक एम नागेश्वर राव के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी 34 पृष्ठों की याचिका में आंध्र प्रदेश कैडर के वर्ष 2000 बैच के आईपीएस अधिकारी मनीष कुमार सिन्हा ने यह स्तब्ध करने वाला खुलासा किया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सीबीआई जांच में दखल देने के एवज में सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के हिमायती हरिभाई पार्थिकभाई चौधरी, अजित डोभाल, सुरेश चंद्रा, पीके सिन्हा सामंत गोयल एवं केवी चौधरी समेत पीएम के कई करीबी मंत्रियों, अधिकारियों और नेताओं ने करोड़ों रुपये की कमाई की है। बहरहाल, मुझे नहीं पता कि मान्यवर मनीष कुमार सिन्हा व एके बस्सी की सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका में कितना दम है और विवादास्पद बफलो मीट एक्सपोर्टर मोइन अख्तर कुरैशी के बेहद करीबी सना सतीश बाबू नेक्या 1984 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को रिश्वत दी थी अथवा कि एजीएमयूटी कैडर के 1979 बैच के आईपीएस अधिकारी आलोक वर्मा ने सना सतीश बाबू से रिश्वत ली थी? लेकिन इस सच से तो सुप्रीम कोर्ट ी वाकिफ है कि सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन की नयी दिल्ली स्थित हेडक्वार्टर पर पीएमओ से कहीं अधिक मजबूत पकड़ मोइन अख्तर कुरैशी की है और मीट की निर्यात करने वाली कंपनियों से वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के मौके पर बतौर चंदे बीजेपी को करीब 250 करोड़ रुपये मिले थे और यही एकमात्र वजह है कि मोइन अख्तर कुरैशी को दस जनपथ के करीबी करार देने वाले नरेंद्र मोदी के वर्तमान प्रधानमंत्रित्व काल में पीएमओ के तहत काम करने वाली सीबीआई के निदेशकों के दफ्तर सदैव विवादास्पद मीट कारोबारी मोइन अख्तर कुरैशी की हिफाजत में ही मशगूल रहे हैं। निःसंदेह ऐसा मुकाम तो आजादी के बाद पहली बार नमूदार हुआ, जब संदिग्ध कारोबारियों से बड़े राजपत्रित अधिकारियों के अपवित्र रिश्ते के कारण सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन एवं सेंट्रल विजिलेंस कमीशन का समूचा आंतरिक तंत्र लाइलाज कलह से चूर-चूर होता दिख रहा है और नरेंद्र दामोदर दास मोदी सीबीआई में मचे मौजूदा घमासान पर हकीकत बयां करने से महज इसलिए बच रहे हैं कि दागदार छवि के उनके खुद के चहेते अधिकारियों की नियुक्ति दिल्ल्ी के अधिकांश बड़े ओहदों पर है तथा इन नियुक्तियों के केंद्र में मौजूदा भाजपा सुप्रीमो समेत उनके स्वयं के पूर्वकर्मों का साया है। बाबू नरेंद्र दामोदर दास मोदी के कैरियर में ऐसे बहुत से राज हैं जो उनके विश्वस्त सहयोगियों की मदद से दफन कर दिये गये। 16वीं लोकसभा चुनाव से ठीक पहले वर्ष 2013 में मोदी और शाह गुजरात के आला पुलिस अधिकारियों, विधि विशेषज्ञों, वरिष्ठ नौकरशाहों और गुजरात सरकार के मंत्रियों के साथ विवादों में फंसे हुए थे। एक चौंकाने वाले स्टिंग ऑपरेशन में गुजरात सरकार के वरिष्ठ अधिकारी और आला पुलिस अधिकारी इशरत जहां, जावेद शेख, अमजद अली राणा और जीशान जोहर की कथित फर्जी मुठभेड़ के बारे में सीबीआई की पड़ताल को लटकाने की कोशिशों के बारे में चर्चा करते पाये गये थे। उस मीटिंग का मकसद, सीबीआई जांच को प्रभावित करना अदालत को धोखे में रखना तथा आरोपी पुलिस अधिकारियों व मंत्रियों को कानून के शिकंजे से बचाना था और हकीकत तो यहां तक है कि गोधरा रेलवे स्टेशन परिसर में वर्ष 2002 में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में लगी, आग के चपेट में आने से 59 यात्रियों की हुई मौत समेत अहमदाबाद में 15 जून, 2004 को पुलिस की गोली से हुई इशरत जहां, जावेद शेख, अमजद अली राणा व जीशान जोहर की मौत की पड़ताल मामले में ी 1984 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना की भूमिका को लेकर कई मीडिया रिपोर्टों में सवाल खड़े किये गये थे। गौड़ा दवा कंपनी स्टर्लिंग बॉयोटेक के 5000 करोड़ रुपये के घोटाले में राकेश अस्थाना की संदिग्ध भूमिका की चल रही जांच के नतीजे अब तक सार्वजनिक नहीं हुए है, जबकि वर्ष 2016 में बड़ोदरा में हुई अपनी बेटी की शादी में अस्थाना ने अतिथियों का फाइव स्टार सत्कार किया था और बेशर्मी की तमाम हदें पार करते हुए अस्थाना ने पुलिस वेलफेयर फंड से भाजपा को बीस करोड़ रुपये चंदे दिये तथा इसी के एवज में संभवतः सीबीआई निदेशक पद पर आलोक वर्मा की हुई नियुक्ति से पूर्व जून 2016 में जब महत्वपूर्ण मामलों की जांच तेज करने के लिए सीबीआई ने एसआईटी गठित की तो उसकी कमान राकेश अस्थाना को ही मिली और वही सीबीआई में मचे मौजूदा घमासान से पूर्व तक मनी लांड्रिंग में फंसे मीट कारोबारी मोइन अख्तर कुरैशी व नौ हजार करोड़ रुपये बैंकों के लेकर फरार शराब कारोबारी विजय माल्या एवं पंजाब नेशनल बैंक के चौदह हजार करोड़ रुपये लेकर फरार हीरा कारोबारी नीरव मोदी व मेहुल चोकसी के मामले में इन्वेस्टिगेशन कर रहे थे। हरियाणा में जमीन आवंटन घोटाला, अगस्तावेस्ट लैंड हेलीकॉप्टर घोटाला, कोयला घोटाला, एयर सेल मौक्सिस घोटाला, एंबुलेंस घोटाला, वर्ष 2013-14 में सक्षम साक्ष्य के अभाव में आईआरसीटीसी घोटाले में लालू प्रसाद की संलिप्तता की बंद की गयी तहकीकात के संदर् में लालू एंड फैमिली के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले सरीखे राजनीतिक रूप से संवेदनशील केसों की जांच की मान्यवर राकेश अस्थाना की मॉनिटरिंग में ही चल रही थी, बावजूद इसके कि नरेंद्र दामोदर दास मोदी के मुख्य मंत्रित्वकाल में ी वह विवादों का पोस्टरब्वॉय हुआ करते थे। वह वर्ष 1984 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना ही थे, जिन्होंने इशरत जहां, जावेद शेख, अमजद अली राणा व जीशान जोहर की 15जून, 2004 को पुलिस की गोली से हुई मौत को आपत्तिजनक करार देने से इनकार करते हुए खुलासा किया था कि मारे गये चारों लोग लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे। सितंबर, 2009 में अहमदाबाद मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एस पी तमांग ने इस घटना को फर्जी मुठभेड़ करार दिया था और दो साल बाद मुठभेड़ की जांच कर रही विशेष जांच टीम ने ी इन चारों की हुई मौत को फर्जी पुलिस एनकाउंटर का नतीजा करार दिया था, जिसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने दिसंबर, 2011 को यह मामला सीबीआई को सुपुर्द कर दिया था। सीबीआई को मामला सौंपने के एक महीने पहले अहमदाबाद एंटीटेररिज्म स्क्वाड के प्रमुख जीएल सिंघल 15 जून, 2004 की अहमदाबाद की घटना को उलझाने की योजना बानाते रिकॉर्ड किये गये थे और रिकॉर्डिंग में कथित तौर पर गुजरात के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह 19 वर्षीया कॉले0ज छात्रा इशरत जहां की पुलिस की गोली से हुई मौत की जांच को हरसंभव बाधित करने के लिए आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल को राज्य के गृह राज्य मंत्री प्रफुल्ल पटेल, राज्य के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी, तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता तुषार मेहता, नरेंद्र मोदी के अति विश्वसनीय आईएएस अधिकारी जीसी मुर्मूवआईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना, तत्कालीन कानून राज्य मंत्री प्रदीप सिंह जडेजा, अहमदाबाद के तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त एके शर्मा एवं कई अन्य से परामर्श करने की सलाह दे रहे थे, जिसे कि खबरिया पोर्टल कोबरा पोस्ट ने सार्वजनिक किया, किंतु इनमें से अधिकांश लोगों का कैरियर हाल के दिनों में चमक गया है, बावजूद इसके कि स्वयं सीबीआई ने ी इशरत जहां की मौत मामले की जांच करते हुए जब आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल के घर पर छापेमारी की थी तो एक पेन ड्राइव जब्त किया, जिसमें 267 रिकॉर्डिंग थी और दावा किया गया कि इसमें से एक रिकॉर्डिंग में गुजरात सरकार के बनाने की बात थी। सीबीआई को हाथ लगे ऑडियो टेपों में गुजरात के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी यह कहते सुने जा रहे हैं कि उन्होंने इशरत जहां के मौत मामले की जांच कर रही टीम के एक सीनियरआईपीएस अधिकारी मोहन झा को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जीसी मुर्मू की उपस्थिति में अपने केबिन में बुलाकर जांच टीम से अलग हो जाने की हिदायत देते हुए कहा है कि मोदी शाह आरोपियों के संपर्क में है और उनकी मदद करने के इच्छुक हैं। यद्यपि, इस आपत्तिजनक खुलासे की सीबीआई की टीम ने जांच प्रारंभ की तो जांच कर्ताओं को सीबीआई दफ्तर से बाहर कर दिया गया और प्रोफेशनल मिसकंडक्ट में शामिल गुजरात के अधिकारियों को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने व्यवस्थित तरीके से दिल्ली के अलग-अलग अहम ओहदों पर नियुक्त कर दिया। आश्चर्यजनक तो यह कि गुजरात के आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल के आवास में हुई छापेमारी में बरामद ऑडियो टेप के अनुसार इशरत जहां मौत मामले की छानबीन को लटकाने की कोशिश में शामिल अधिवक्ता तुषार मेहता को नरेंद्र मोदी के मौजूदा प्रधानमंत्रित्व काल में भारत का सॉलिसिटर जनरल बना दिया गया है, जबकि संदिग्ध चरित्र के सीनियर आईएएस अधिकारी जीसी मुर्मू को केंद्रीय राजस्व मंत्रालय में विशेष सचिव एके शर्मा को सीबीआई में संयुक्त निदेशक व राकेश अस्थाना को विशेष निदेशक नियुक्त कर दिया गया। जमानत पर जेल से रिहा हुए जीएल सिंघल गुजरात राज्य रिजर्व पुलिस के कमांडेट बने और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बनने में नाकाम कमल त्रिवेदी गुजरात के महाधिवक्ता है, परंतु जीएल सिंघल के आवास में हुई सीबीआई छापेमारी का नेतृत्व कर रहे नगालैंड कैडर के आईपीएस अधिकारी संदीप तामगाडगे को नरेंद्र दामोदर दास मोदी की देखरेख में वापस अपने कैडर में भेज दिया गया और भविष्य में प्रमोशनों के अवसरों से उन्हें प्रभावशाली रूप से सिर्फ व सिर्फ इसलिए वंचित कर दिया गया कि सोहराबुद्दीन व उसके साथी तुलसी प्रजापति की गुजरात पुलिस की फर्जी एनकाउंटर में हुई मौत मामलों में ी कोर्ट में दायर अपनी पूरक चार्जशीट में संदीप तामगाडगे ने अमित शाह की भूमिका को आपत्तिजनक करार दिया था। किंतु कोर्ट में दायर की गयी पूरक चार्जशीट की वजह से तामगाडगे की हुई दुर्गति से हतोत्साहित सीबीआई ने अंततः न्यायालय के समक्ष अपनी क्षमता प्रदर्शित नहीं की और अमित शाह बरी हो गये, जबकि इशरत जहां मामले में जांच एजेंसियां आरोपी अधिकारियों पर मामला चलाने की अनुमति का इंतजार कर रही है, जो अहमदाबाद की विशेष सीबीआई अदालत में लंबित है। ऐसे में जब हम 23 अक्तूबर, 2018 की आधी रात के सरकार के फैसले को सीबीआई बनाम सीबीआई के मामले की तरह पेश करते हैं, तो निश्चित तौर पर हम भी निजी हितों के लिए सीबीआई की छवि खराब करने वालों के एजेंडे को ही पुख्ता करने लगते हैं, अन्यथा इसे तो कतई भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि 23 अक्तूबर, 2018 की आधी रात के केंद्र सरकार के फैसले से देश की शीर्ष अदालत तक सहमत नहीं है और स्वयं चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली जस्टिस संजय किशन कौल व जस्टिस कुट्टिल मैथ्यू जोसेफ की पीठ ने 6 दिसंबर, 2018 को सभी संबंधित पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद टिप्पणी की है कि खुद अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष खुलासा किया है कि आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच विवादों की शुरुआत जुलाई 2018 में ही हो गयी थी, तो फिर किन वजहों से तीन महीने तक इसकी अनदेखी करने के बाद पीएमओ ने बगैर चयत समिति के परामर्श के 23 अक्तूबर, 2018 की मध्य रात्रि को सीबीआई निदेशक को उनके अधिकार से वंचित करने के फैसले किये? बेशक ही सीबीआई में मचे मौजूदा घमासान की वजह अपने हितों के लिए पीएमओ द्वारा इसका निरंतर राजनीतिकरण करना है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही पूर्व में भी अपने-अपने हितों में सीबीआई का इस्तेमाल किया है, लेकिन आज की तरह के हालात पहले कभी नहीं रहे, बावजूद इसके कि वर्ष 2013 में न्यायालय ने सीबीआई को मालिक की बोली रटने वाला तोता बताया था, वर्ष 2014 में सीबीआई निदेशक को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जांच से दूर रहने को कोर्ट ने कहा था कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया बदली थी। वर्ष 2016 में विजय माल्या के खिलाफ जारी लुकआउट नोटिस स्वयं सीबीआई ने बदल दिया और सीबीआई के गैर जिम्मेदाराना हरकतों की वजह से वर्ष 2016 में बीके बंसल और उनके बेटे ने खुदकशी की थी तथा आरके दंपति ने सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर के पद को तिलांजलि दी थी। पूर्व सीबीआई प्रमुख एपी सिंह पर वर्ष 2017 में सीट एक्सपोर्टर मोइन अख्तर कुरैशी से सांठगांठ के आरोप लगे थे। हाल में संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के मामले निपटाने में सीबीआई की धीमी रफ्तार पर स्वयं केंद्रीय सतर्कता आयोग ने ही चिंता जतायी है और खुलासा किया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत सीबीआई द्वारा दर्ज कुल मामलों में से साढ़े तीन फीसदी मामले विगत बीस सालों में लंबित पड़े हैं और पचास फीसदी से अधिक मामले दस वर्षों से लंबित पड़े हैं, पर पीएमओ ने बीते साढ़े चार सालों में बिल्कुल भी इसकी परवाह नहीं की है और भ्रष्टाचार के खिलाफ मान्यवर नरेंद्र दामोदर दास मोदी के लच्छेदार भाषणों के सीबीआई पर पड़े असर का आलम यह है कि एयरसेल मैक्सिस 2जी स्पेक्ट्रम व बेल्लारी अवैध खनन घोटाला समेत अरुषि हेमराज हत्याकांड मामले में सीबीआई आरोपियों का जुर्म साबित करने नाकाम रही तथा सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना बगैर आलोक वर्मा से परामर्श किये सुशील कुमार मोदी के इशारे पर आईआरसीटीसी घोटाले में लालू प्रसाद एंड फेमली की संलिप्तता को साबित करने को कोशिश में मशगूल रहे, जबकि केंद्र की मौजूदा सरकार सीबीआई अफसरों के खिलाफ विगत चार सालों से लंबित 29 विभागीय मामले को संज्ञान में नहीं ले रही है और आपसी कलह में उलझी एजेंसी के 7000 से अधिक कर्मी इन दिनों सदमे में है, बावजूद इसके कि 1328 पद विगत चार सालों एजेंसी में खाली पड़े हैं और सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी दुविधा से मुकाबिल है। हालांकि, 6 दिसंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने राख होती सीबीआई की साख पर चिंता जतायी है, पर चंद्रबाबू नायडू एवं ममता बनर्जी की संयुक्त कार्रवाई ने सीबीआई के आंतरिक टकराव को निर्णायक रूप से राजनीतिक विवाद का हिस्सा बना दिया है और आरोप -प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है तथा मोदी मुक्त भारत के लिए जनता की उत्सुकता 11 दिसंबर, 2018 को सार्वजनिक हो गयी है।

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