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  • FIR आप का अधिकार है..!! 【रजिया.एस.रूही】

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    follow रजिया.एस. रूही, अधिवक्ता
    कानपुर

    रोज़ की तरह चेम्बर पहुंची तो वहाँ पर कुछ लोग पहले से आये हुए थे.. एक 23- 24 साल की लड़की, उसके माता पिता और एक कोई उनका रिश्तेदार। शक्ल व कपड़े लत्तों से कम पढ़े लिखे और आर्थिक रूप से कमज़ोर ही दिख रहे थे.. पूंछने पर मालुम हुआ कि लड़की की शादी कुछ दिन पहले ही इसी शहर में हुई है, पग फेरे के लिये बेटी को ले कर आये तो उसका पूरा शरीर चोटों से भरा था, कंधे पीठ कमर कूल्हे जांघे सब नीले पड़े थे। सीधे सीधे घरेलू हिंसा और दहेज़ प्रताड़ना का अपराध दिख रहा था, लेकिन पुलिस उनकी FIR नहीं लिख रही थी। मैंने एक लड़के को उनके साथ भेजा, पुलिस वालों ने तब भी FIR नहीं लिखी उल्टा बोले कि दूसरी पार्टी को बुलाएंगे पूंछ तांछ करेंगे, क्या पता घटना झूठी हो (जब कि हिंसा के प्रत्यक्ष प्रमाण उस लड़की के शरीर पर मौजूद थे)

    वकील चाहें तो कोर्ट में परिवाद दायर कर के FIR/ इन्वेस्टीगेशन के ऑर्डर करा सकते हैं, लेकिन मुझे उन पुलिस वालों से मिलना ज़रुरी लगा, उनको कानून पढ़ाने का मन हो रहा था.. खैर मेरे वहाँ पहुँचते ही न सिर्फ़ FIR लिखी गयी बल्कि तुरंत लेडी कांस्टेबल के साथ लड़की को मेडिकल एग्ज़ामिन के लिये भेजा गया।

    ऐसी स्थिति हम में से किसी के भी साथ या हमारे जानने वालों के साथ हो सकती है। पुलिस वाले आप को बेवकूफ़ इसलिये बनाते हैं क्यों कि आप को अपने कानूनी अधिकार नहीं पता होते।

    पढ़े-लिखे हैं तो क्रिमिनल प्रॉसिजर कोड,पुलिस एक्ट की बेसिक जानकारी रखिये।

    1- यदि किसी पुलिस स्टेशन में किसी संज्ञेय अपराध के कारित होने की सूचना दी जाती है तो ऑफीसर इंचार्ज को तुरंत हर हाल में FIR दर्ज करवानी होगी। सूचना को झूठी बता कर पुलिस FIR लिखने से मना नहीं कर सकती, बाद में छानबीन से अपराध की पुष्टि न होने पर वो फाईनल रिपोर्ट लगा सकती है। मामला किसी दूसरे थाने के अंतर्गत आता हो तो भी नज़दीकी पुलिस स्टेशन में जीरो FIR लिखे जाने का प्रावधान है, बाद में ये FIR सम्बन्धित थाने को ट्रांसफर कर दी जाती है।

    2- पुलिस FIR लिखने से मना करे तो आप शहर के SP से शिकायत कर सकते हैं। SP को लिखित रूप से शिकायत रजिस्टर्ड पोस्ट के ज़रिये भेज सकते हैं, इसकी रसीद सम्हाल कर रखियेगा।

    3- आप सम्बन्धित ज्यूरिस्डिक्शन वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने जा कर परिवाद कर सकते हैं।

    आप राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत कर सकते हैं।

    FIR लिखना और इन्वेस्टीगेशन करना पुलिस वालों की ड्यूटी है, न करने पर उनको इस लापरवाही के लिये सस्पेंड भी किया जा सकता।

    FIR कौन लिखवा सकता है?

    वह व्यक्ति जिसके साथ अपराध घटित हुआ है/ उसका कोई सम्बन्धी/ वह व्यक्ति घटना से किसी भी प्रकार जुड़ा हुआ हो/ अन्य कोई भी व्यक्ति जिसने अपराध कारित होते हुए देखा हो या जिसे अपराध कारित होने की जानकारी हो।

    सम्बन्धित थाने में अपराध कारित होने की सूचना यदि फोन पर दी जाती है, तो उस फोन पर दी गयी सूचना को ही FIR के रूप में रिकॉर्ड किया जा सकता है। आज कल कई जगहों पर ऑनलाईन FIR दर्ज कराने की भी सुविधा है।

    FIR दर्ज करवाते समय किन बातों का ध्यान रखें–?

    1-घटना का सही समय लिखवाना चाहिए।
    2-घटना का सही स्थान।
    3-घटना की सही तारीख।
    4-अपराध घटित होने के बाद जितनी जल्दी हो सके प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहिए, क्योंकि विलम्ब से सूचना देने पर आरोपियों की तरफ से प्रायः तर्क दिया जाता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट सोच-विचार कर तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर मनगढंत तथ्यों के आधार पर लिखायी गई है, जिससे आरोपियों को संदेह का लाभ मिल सकता है।

    5-प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखवाने के पश्चात् अंत में रिपोर्ट लिखाने वाले का नाम, पिता का नाम, पता और हस्ताक्षर भी होने चाहिए। रिपोर्ट दर्ज करने वाले अधिकारी को रिपोर्ट वादी को पढ़कर सुनाना चाहिए।

    6- रिपोर्ट लिखवाने के बाद FIR की कॉपी संबंधित थाने से वादी को मुफ्त में उपलब्ध करायी जाती है।

    7- प्रथम सूचना रिपोर्ट में आरोपी का नाम और उसका विस्तृत विवरण जैसे उसका रंग, ऊंचाई, उम्र, पहनावा और चेहरे पर कोई निशान आदि जरूर लिखवाना चाहिए यदि ज्ञात है तो।

    8- अपराध कैसे घटित हुआ (अपराध घटित करते समय अपराधियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले हथियार/औजार का नाम, गाड़ी नम्बर या अन्य तथ्य) अवश्य दर्शाना चाहिए।

    9- अभियुक्त द्वारा चुरायी गयी या ली गयी वस्तुओं की सूची।

    10- अपराध के समय गवाहों के नाम और उनका पता यदि उपस्थित रहे हों तो।

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