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  • वजीर-ए-आजम के बेधड़क बोलने के हुनर की मुश्किलें

     

     

    enter प्रो.दिग्विजयनाथ झा

    नजर-नजर में उतरना कमाल होता है,

    नफस-नफस में बिखरना कमाल होता है।

    बुलंदियों पर पहुंचना कोई कमाल नहीं,

    बुलंदियों पर ठहरना कमाल होता है।

    • मशहूर भारतीय शायर अशोक साहिल से उधार ली गयी इन चंद पंक्तियों से अपनी बात सिर्फ इसलिए शुरू कर रहा हूं कि सवा सौ करोड़ के अजीम मुल्क के वजीर-ए-आजम को हम झूठा तो कतई भी कह नहीं सकते, क्योंकि ऐसा कहने से मुल्क के सवा सौ करोड़ लोगों की तौहीन होगी। हम बेधड़क बोलने के हुनर से लैस नरेंद्र दामोदर दास मोदी भी नहीं है कि विदेशों में जाकर अपने ही मुल्क और मुल्क के गुजर चुके बड़े से बड़े लीडरों पर कीचड़ उछालने का काम करते हुए बेधड़क कहते फिरें कि विगत 67 सालों में भारत में कुछ हुआ ही नहीं तथा दुनिया में हिंदुस्तान को जितना एहतराम और इज्जत वर्ष 2014 के मई महीने के बाद से मिला है, उतना कभी नहीं मिला। हो सकता है कि मोदी खुद को इक्कीसवीं सदी के चुनाव जीतने के अपराजेय हुनर के इकलौते बादशाह मान बैठे हों, लेकिन हमारा सवाल तो वही है कि क्या कोई भी वजीर-ए-आजम अपने मुल्क के लोगों से सरेआम गलतबायानी कर सकता है या यूं कहा जाए कि क्या किसी जम्हूरी सिस्टम में मुल्क के वजीर-ए-आजम को इस बात की इजाजत है कि वह मुल्क के लोगों के साथ वादाखिलाफी करे। बिजली की खपत में विगत चार सालों में देश में बिल्कुल भी इजाफा नहीं हुआ है, जबकि श्रद्धेय नरेंद्र दामोदर दास मोदी के हावे पर यकीन करें तो वर्ष 2014 से पूर्व तक विद्युत सुविधा से वंचित 18452 भारतीय गांवों के विद्युतीकरण की प्रक्रिया पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत पूरी कर ली गयी है। बड़े ही बेधड़क अंदाज में वजीरे आजम कहते हैं कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने बीते दो सालों में तकरीबन चार करोड़ गरीब भारतीय महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराये हैं, जबकि तल्ख हकीकत यह है कि वर्ष 2014 के मुकाबले वर्ष 2018 में भारत में तरलीकृत पेट्रोलयम गैस की खपत में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत विगत चार सालों में 31.48 करोड़ भारतीयों के खाते बैंकों में खुले, पर इनमें से 76.81 फीसदी खातों में महज एकाध रुपये किसी बैंक कर्मियों ने ही कभी जमा कराये हैं और स्वयं केंद्रीय राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने अभी हाल ही में राज्यसभा में खुलासा किया है कि बीते चंद महीनों में 79 लाख से अधिक निष्क्रिय पड़े जीरो बैलेंस अकाउट्स को बैंकों ने निरस्त कर दिया है। मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने देश के सकल घरेलू उत्पाद में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 25 फीसदी तक सुनिश्चित करने के दावे किये थे, परंतु क्रिसिल की रिपोर्ट कहती है कि आज की तारीख में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी महज 16 फीसदी के आस पास है और तल्ख सच्चाई तो यहां तक है कि मोदी के मौजूदा प्रधान मंत्रित्व काल के मुकाबले मनमोहन के प्रधानमंत्रित्वकाल में देश में मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र के विकास की रफ्तार तेज थी। मौजूदा पीएम के बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की जमीनी हकीकत यह है कि वर्ष 2012-14 में प्रति एक हजार बालक जन्मदर की अपेक्षा कन्या जन्म दर 906 थी, जो 2015-17 में घटकर 898 हो गयी और भारत के बालिका शेल्टर होम यौन शोषण के सर्वाधिक सुरक्षित ठिकाने बनकर रह गये। श्रीयुत नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान की धीमी रफ्तार का आलम यह है कि खुले में शौच से मुक्ति के सपने देख रहे 55 फीसदी भारतीयों के घरों में शौचालय के निर्माण कार्य प्रारंभ तक नहीं हुए हैं, जबकि राजग की मौजूदा सरकार महज छह महीने की मेहमान है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक करोड़ गरीब ग्रामीण परिवारों को बिल्कुल मुफ्त कम लागत के पक्के मकान मुहैया कराने के वादे वर्ष 2016 में मोदी ने किये थे, लेकिन अब तक 45 लाख गरीब ग्रामीण परिवारों को भी मुफ्त में कम लागत के पक्के मकान मुहैया नहीं कराये गये हैं। दिलचस्प तो यह है कि 46 लाख विपन्न शहरी भारतीय परिवारों को भी मुफ्त पक्के मकान की सुविधा से लैस करने के वादे पीएम ने किये थे, परंतु बीस फीसदी भी अब तक पूरे नहीं किये हैं। नमामि गंगे योजना के तहत प्रस्तावित 4816 किलोमीटर सीवेज नेटवर्क में से अब तक सिर्फ 1879 किमी ही बनकर तैयार हुए हैं। मुझे नहीं पता कि हर घर नल के जल पहुंचाने के मोदी के वादे कभी पूरे होंगे भी या कि नहीं, क्योंकि वर्तमान राजग सरकार के कार्यकाल के आखिरी वर्ष में भी देश के तकरीबन 17 हजार से अधिक ग्रामीण इलाकों में लोग दूषित जल पी रहे हैं। वर्ष 2015 में शुरू की गयी प्रधानमंत्री मुद्रा योजनाओं के तहत स्वरोजगार के लिए बैंकों ने अब तक तकरीबन साढ़े तीन करोड़ नर और नौ करोड़ नारियों के बीच बतौर कर्ज कुल 2125 करोड़ रुपये वितरित किये हैं यानी कि सवा सौ करोड़ के अजीम मुल्क के वजीरें आजम के पहल पर स्व रोजगार के लिए प्रति भारतीय औसतन 17 हजार रुपये बतौर कर्ज बैंकों ने दिये हैं, जबकि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, मेक इन इंडिया, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, स्वच्छ भारत मिशन, नमामि गंगे योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, स्मार्ट सिटी मिशन डिजीटल इंडिया व स्किल इंडिया समेत अन्य बेशुमार स्कीमों के प्रचार-प्रसार मद में केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था बीओसी (लोक संपर्क व संचार ब्यूरो) ने विगत साढ़े चार सालों में 5408.61 करोड़ रुपये खर्च किये हैं, पर यह खुलासा नहीं किया है वर्ष 2004 के बीच डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली सरकार ने विभिन्न केंद्रीय स्कीमों के प्रचार प्रसार मद में महज 5040 करोड़ रुपये ही खर्च किये थे। बेशक, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि यूपीए ने जहां अपने दस साल के कार्यकाल में विज्ञापनों पर औसतन 504 करोड़ रुपये सालाना खर्च किया था, वहीं नरेंद्र दामोदर दास मोदी के नेतृत्ववाली राजग सरकार के मौजूदा कार्यकाल में विज्ञापनों पर हर साल औसतन 1202 करोड़ की राशि खर्च की गयी है, बावजूद इसके कि स्वयं आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने अभी हाल ही में यह आपिŸाकाल खुलासा किया है कि प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी मिशन के तहत कुल चयनित 90 
      भारतीय शहरों में से महज 60 शहरों को अत्याधुनिक सुविधा से लैस करने के लिए आवंटित कुल 9860 करोड़ रुपये में से अब तक सिर्फ 645 करोड़ रुपये ही खर्च हुए हैं। मोदी के डिजीटल इंडिया अभियान की जमीनी हकीकत तभी आज की तारीख में यही है कि दूरसंचार क्षेत्र की बीएसएनएल जैसी बड़ी सरकारी कंपनी इन दिनों सर्वाधिक संकट के दौर से गुजर रही है, जबकि भारत के डेढ़ लाख से अधिक ग्राम पंचायतों में अब तक ब्रांड बैंक कनेक्टिविटी नहीं पहुंची है और 92 फीसदी भारतीय ग्रामीण महिलाओं के हाथों में स्मार्ट फोन अब तक नहीं है। हतप्रभ करने वाली बात तो यह कि 40 करोड़ युवक युवतियों को हुनरमंद बनाने के मकसद से वर्ष 2015 में शुरू की गयी कौशल विकास योजना न तो आधे करोड़ से अधिक भारतीय नजर नारियों को अब तक हुनरमंद बना पायी है और न ही रोजगार को लेकर कोई बेहतर प्रदर्शन आज की तारीख तक भारत में कर पायी है। स्वयं ही कौशल विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गत 28 मार्च, 2018 को राज्य सभा में खुलासा किया है कि पीएम के महत्वाकांक्षी कौशल विकास योजना के अंतर्गत तकरीबन 50 लाख भारतीय नर-नारियों को प्रशिक्षित किया गया, परंतु रोजगार इनमें से सिर्फ 14.5 फीसदी को ही मिले और बाकी सभी बेरोजगार ही रहे, बावजूद इसके कि देश के 485 जिलों में फैले 500 से अधिक कौशल विकास केंद्रों के प्रबंधन मंद में सरकार ने अब तक 12187 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। सर्वाधिक शर्मनाक तो यह कि तोपों की गर्जना व राष्ट्रगान की धुन के बीच 374 साल पुराने मुगलकाल के जिस लाल किले की प्रचीर से झंडा फहराते हुए नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने वर्ष 2014 में सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत की थी और वर्ष 2019 तक कम से कम 2450 भारतीय गांवों को सांसद विकास निधि की राशि से सभी आवश्यक सुविधाओं से लैस करने की गुहार तमाम सांसदों से लगायी थी, उसी लाल किले की प्रचीर से वर्ष 2018 में झंडा फहराते हुए वजीर ए आजम ने यह खुलासा नहीं किया कि बतौर स्थानीय सांसद खुद के द्वारा गोद लिए गये बनारस संसदीय क्षेत्र के चार गांवों में उन्होंने स्वयं के अपने सांसद विकास निधि से फूटी कौड़ी भी अब तक खर्च नहीं की है और इन चारों गांवों में विकास के जो भी काम हुए हैं वे सारे या तो सरकारी योजनाओं से या फिर कॉर्पोरेट की सामाजिक दायित्व निधि से। सूचना का अधिकार अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत उपलब्ध करायी गयी जानकारी के मुताबिक सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत कम से कम तीन भारतीय गांवों को गोद लेने की पीएम की गुहार की लगभग सभी मौजूदा सांसदों ने अनदेखी की है तथा सांसद विकास निधि की राशि से सांसद आदर्श ग्राम योजना के सशक्त कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने से अप्रत्यक्ष तौर पर इनकार कर दिया है। हालांकि नरेंद्र मोदी एकमात्र मौजूदा सांसद हैं जिन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव को 07 नवंबर, 2014 को, थानेपुर गांव 16 फरवरी, 2016 को काकरहिया गांव को 23 अक्तूबर 2017 को और डोमरी गांव को 06 अप्रैल, 2018 को गोद लिया है, लेकिन इन चारों गांवो के विकास मद में अपने सांसद विकास निधि से फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं किया है। प्रत्येक साल दो करोड़ नौकरियों के लुभावने वायदे के साथ वर्ष 2014 के मई महीने में केंद्र की सत्ता में आई बीजेपी अपने मौजूदा कार्यकाल के आखिरी साल पूरे करने जा रही है, लेकिन युवा शक्ति का राष्ट्र निर्माण में उपयोग करने में अक्षरशः नाकाम रही। बीते साढ़े चार सालों में 36 लाख सालाना की दर से ही देश में रोजगार पैदा हो पाये हैं। स्वयं केंद्रीय श्रम व रोजगार मंत्रालय ने खुलासा किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में 8 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाली संगठित क्षेत्र में जहां वर्ष 2014-15 में 4.93 लाख, 2015-16 में 1.55 लाख, 2016-17 में 2.31 लाख और 2017-18 में 2.16 लाख रोजगार ही पैदा हुए, वहीं असंगठित क्षेत्र में नोटबंदी के बाद से रोजगार की संभावनाएं नकारात्मक रूप से प्रस्तावित हुई। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी अभी हाल ही के अपने एक अध्ययन में कबूल किया है कि विगत साढ़े चार सालों में भारत में रोजगार काफी कम पैदा हुए हैं। इतना ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर पैनी निगाह रखने वाली एक मशहूर निजी एजेंसी सेंटर फॉरमानिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के दावे पर यदि यकीन करें तो वर्ष 2014 में भारत में बेरोजगारी की दर 3.87 फीसदी थी जो बढ़कर 2015 में 4.49, अच्छी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी दर में चार फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी को शुभ तो कतई  नहीं कह सकते हैं। कृषि लागत पर किसानों को पचास फीसदी मुनाफा देने के वायदे के साथ 26 मई, 2014 को केंद्र में बनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने देने के वायदे के साथ 26 मई, 2014 को केंद्र में बनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने स्वयं संसद और सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि देश में 2014 के बाद कर्ज में डूबे होने की वजह से औसतन प्रति वर्ष 12 हजार किसानों ने आत्महत्या की है, किंतु मुगलकाल के 378 साल पुराने लाल किले की प्रचीर से लगातार पांच वीं बार राष्ट्र को संबोधित करते हुए 15 अगस्त, 2018 को वजीर ए आजम ने यह खुलासा नहीं किया कि वर्ष 2018 के ही जून महीने में पंजाब के एक किसान ने कई एकड़ में लगी अपनी भिंंडी की पूरी की पूरी फसल पर सिर्फ व सिर्फ इसलिस ट्रैक्टर चला दी कि भिंडी के उत्पादन लागत उसे लगभग आठ रुपये प्रति किलो आयी थी और बाजार में उसकी कीमत उसे दो रुपये प्रतिकिलो मिल रही थी, बावजूद इसके कि देश में कुल 4582 विधायकों पर साल में औसतन 7 अरब 50 करोड़, 790 सांसदों पर सालाना 2 अरब 56 करोड़, राज्यपालों पर सालाना 1 अरब 8 करोड़, पीएम के एक दिन के विदेश दौरे पर 21 लाख, राष्ट्र के नाम पीएम के एक संदेश पर 8 करोड़ 30 लाख के चाय नाश्ते पर 25 लाख रुपये खर्च होते हैं। वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर कृषि क्षेत्र के लिए नीतियों बनाने वाले मंत्री व नौकरशाह भिंडी की पूरी की पूरी फसल पर ट्रैक्टर चला देने की घटना से वाकिफ जरूर थे, लेकिन इतने संवेदनहीन हैं कि बगैर पीएमओ के सलाह लिये अधिक उत्पादन को कीमतें गिरने की वजह करार देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लिये, जबकि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के दावे पर यकीन करें तो काम काज के मौजूदा सरकार के गैर जिम्मेदाराना तौर तरीकों की वजह से विगत साढ़े चार सालों में करीब 68 फीसदी किसानों को धान के न्यूनतम सरकारी समर्थन मूल्य तथा 61 फीसदी किसानों को गेहूं के न्यूनतम सरकारी समर्थन मूल्य का लाभ नहीं मिला है और अन्य बीस फसलों के लिए तय किये गये न्यूनतम सरकारी समर्थन मूल्य को तो भारत के निकम्मे नौकरशाहों ने आंशिक तौर पर भी लागू ही नहीं किया है और आलू उत्पादकों ने तो पिछले वर्ष ही देश के कई राज्यों में 50 पैसे प्रतिकिलो की कीमत पर कुले बाजार में आलूओं को बेच दिया था। हम तो हतप्रभ हैं कि बीते साढ़े चार सालों में भारत में पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 211.7 प्रतिशत और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 443 प्रतिशत बढ़ी तथा यूपीए सरकार की तुलना में ढाई गुना अधिक की कमाई राजग की मौजूदा सरकार ने एक्साइज से की है, बावजूद इसके सामाजिक सेक्टर के कई बेहद अहम क्षेत्रों के खर्चे में भारी रकम कटौतियां की गयी है और सच पूछिए तो मुझे तो रत्तीभर भी यकीन नहीं है कि महज 2000 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधानों के बदौलत बाबू नरेंद्र मोदी द्वारा 23 सितंबर, 2018 को लांच की गयी आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना आयुष्मान (लंबी उम्र) होगी। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के आधार पर हम मोदी के इस दावे से सहमत हैं कि हर साल स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च की वजह से पांच करोड़ लोग भारत में गरीब हो जाते हैं, लेकिन यह भी तो सच है कि अस्पताल, डाक्टर्स व नर्स की व्यापक कमी के बीच मुफ्त सेहत बीमा अमल में लाना किसी बीमारी से कम जटिल नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानको के मुताबिक प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर और पांच नर्स की उपलब्धता अनिवार्य है, जबकि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक आज की तारीख में भारत में पंजीकृत डाक्टरों की कुल संख्या 10.45 लाख के आसपास है और देश में 2500 की आबादी पर महज एक नर्स उपलब्ध है। भारत के कुल 472 मेडिकल कॉलेजों में 40 फीसदी मेडिकल शिक्षकों के पद विगत साढ़े चार वर्षों से रिक्त पड़े हैं। देश में इन दिनों लगभग सत्तर हजार छोटे-बड़े अस्पताल हैं, लेकिन तीन हजार अस्पताल ही ऐसे हैं, जिनमें बेड़ों की संख्या सौ अथवा उससे कुछ अधिक है तो फिर महज एक बड़े के सहारे 625 भारतीयों को पीएम कैसे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा सकते हैं? स्वतंत्र भारत के सबसे खर्चीले चुनाव अभियान के बदौलत प्रधानमंत्री बने नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र पर केंद्रीय मंत्रिमंडल के अमल के बगैर कोई परवाह किये हर चौथे दिन एक स्कीम का एलान किया और 27 वें दिन विदेश यात्रा पर निकल गये, किंतु शिक्षा पर जीडीपी के छह फीसदी खर्च करने के भाजपा के संकल्प अब तक पूरे नहीं हुए हैं। देश के प्रतिष्ठित दिल्ली केंद्रीय विश्वविद्यालय में एडहॉक अस्सिटेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत डॉ. सुनैना शर्मा के गृभ में पल रहे आठ माह के बच्चे की हुई मौत के 22 सितंबर, 2018 के खुलासे ने शिक्षाविदों के प्रति सरकारी सिस्टम की क्रुरता को सरेआम उजागर कर दिया है। गत 23 अक्तूबर 2018 की आधी रात को सीबीआई सुप्रीमो आलोक वर्मा के अचानक छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्रीय कार्मिक विभाग के फैसले के पश्चात गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे सीबीआई अधिकारियों के तबादले के नवनियुक्त सीबीआई निदेशक के निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट की 26 अक्तूबर, 2018 की प्रतिक्रिया ने न खाऊंगा, न खाने दूंगा के वजीर-ए-आजम के संकल्प पर सवाल खड़े कर दिये हैं, हालांकि, देश की शीर्ष अदालत के चार तात्कालीन न्यायाधीशों ने तो 12 जनवरी, 2018 को ही वजीर-ए-आजम की कार्यशैली को अप्रत्यक्ष तौर पर देश के अहम शीर्ष संवैधानिक संस्थानों की मर्यादा के प्रतिकूल करार दिया था। अभी हाल ही में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्वायत्ता को इग्नोर करने को लेकर डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी सरकार पर सवाल उठाये हैं और भारत में बैंकिंग व्यवसाय की मौजूदा स्थिति को चिंताजनक करार दिया है। दुनिया के टैक्स हेवन देशों में मौजूद भारतीय नेताओं, नौकरशाहों व उद्योगपतियों के बैंक खातों से तो फूटी कौड़ी भी मोदी अब तक व भारत नहीं ला सके, लेकिन आरटीआई एक्ट के सुसंगत प्रावधानों के तहत स्वयं ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने खुलासा किया है कि विगत साढ़े चार सालों में 100718 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी के कुल 23866 मामले आरबीआई के सामने आये हैं और इस अवधि में देश के 38 सूचीबद्ध वाणिज्यिक बैंकों का एनपीए 1035528 करोड़ रुपये हो चुका है। बेशक, प्रधानमंत्री के बेधड़क बोलने के हुनर की वजह से ही भारत में भाजपा के प्राथमिक सदस्यों की तादाद 11 करोड़ को पार कर गयी है और प्रत्येक दिन छह छात्र गैर भाजपाई दलों की सदस्यता ग्रहण करने में मशगूल हैं, जबकि एक छात्र हर घंटे देश में खुदकुशी कर रहे हैं और दस फीसदी कार्डधारी मनरेगा मजदूरों को भी बीते साढ़े चार सालों में साढ़े तीन महीने भी काम नहीं मिला है, बावजूद इसके कि खजाना खाली बताकर पिछले पांच बजटों में अरुण जेटली ने 1 लाख 33 हजार 203 करोड़ रुपये के नये टैक्स लगाये। मसलन हार्वर्ड से ज्यादा दम होता है हार्ड वर्क में। यह बात जब नोटबंदी के अपने फैसले से उत्साहित नरेंद्र मोदी ने महा राजग की एक जनसभा में वर्ष 2017 में कही थी तो जाहिरा तौर पर वे हार्वर्ड के अध्येताओं पर तंज कस रहे थे, जो देश की काली अर्थव्यवस्था के विरुद्ध 8 नवंबर 2016 की आधी रात के उनके फैसले की तीखी आलोचना करते हैं। बेशक वजीर-ए-आजम के निरंकुश विजाय तौर-तरीकों से यदि भाजपाइयों को कोई परेशानी हो रही हो तो वह बजाय डालर के मुकाबले रुपये की व्यापक बदहाली की चिंता किये आरएसएस सुप्रीमो मोहन भागवत के 18 अक्तूबर 2018 के प्रवचन को सुनकर सुकून महसूस कर सकते हैं। भले पेट्रोल, डीजल और गैस की बढ़ती कीमतों पर कुछ भी कहने से भागवत ने दूरी बना रखी है, पर अयोध्या में राममंदिर निर्माण का श्रेय लूटने के लिए साधु संतों और हिंदूवादी संगठनों-पार्टियों में मची होड़ के बीच गत 18 अक्तूबर, 2018 को विजयदशमी के पवित्र मौके पर कैलाश सत्यार्थी के मौजूदगी में अपना रुख अपने 84 मिनट के संबोधन में इससे वाकिफ होते हुए ही साफ कर दिया कि लोकसभा में
      भाजपा की ताकत 2014 के मुकाबले 2018 में घटी है और 2019 में नरेंद्र मोदी पीएमओं में राहुल की एंट्री को कतई भी बरकरार नहीं रख सकते हैं। पूर्व भाजपा सुप्रीमो लालकृष्ण आडवाणी व पूर्व हिंदूवादी नेता डॉ. प्रवीण तोगडि़या भले ही इन दिनों हाशिए पर हों, लेकिन इन दोनों के समर्थक भाजपाई मोदी के विजय रथ को वर्ष 2019 में रोक सकते हैं और गैर भाजपाई दलों की चुनावी मुश्किलें काफी हद तक कमकर सकते हैं भले ही चार राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजे जो 2018 के दिसंबर में कुछ भी हों।

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