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  • तूफान लाने का संकेत है , नितीश कुमार की चतुर चुप्पी

    https://sunuiorise.com/mosti-mefedron-shishki-geroin-kokain-metadon-mdma-mef-amfetamin.html प्रो.दिग्विजय नाथ झा ब्यूरो चीफ असम, बिहार

    हम गौतम बुद्घ की संतान हैं। हम भगवान महावीर के अनुयायी है। हम गुरुगोविंद सिंह के शिष्य है। हम महाकवि कालिदास कवि कोकिल विद्यापति के वंशज हैं। हम डॉ. राजेंद्र प्रसाद की औलाद हैं। हम जे.पी. के फालोअर हैं। डींगमारने में मत पूछिए… हमारी जन्म भूमि बिहार का कोई जवाब नहीं। बिहार का समाजवादी सीना फुलाकर कहेगा-मौलाना मजहरुल हक यहीं हुए। समुद्र गुप्त यहीं हुए। चाणक्य यहीं हुए। सम्राट अशोक यहीं हुए। आर्य भट्ट और पाणिनी भी यहीं हुए। यहां तक कि मैया सीता भी इसी धरती पर पैदा हुई। दिनकर हुए। रेणु हुए। बाबा नागार्जुन हुए। नेपाली हुए। राहुल सांकृत्यायन हुए। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन यहीं से प्रारंभ हुए। कहने को जेपी भक्त बिहारी यहां तक कहेगा कि बिहार नहीं होता, तो भारत नहीं होता, लेकिन यह नहीं कहेगा कि बिहार नहीं होता तो पुलिस संरक्षण में चूहे के शराब पीने की जानकारी से भारत वाकिफ नहीं होता और अवैध हथियार समेत एक हजार व पांच सौ के निष्प्रभावी नौटंकी के प्रति एक सीनियर आईपीएस अफसर की अटूट निष्ठा की चौकाने वाली खबरों से देश अनजान होता।

    बेशक, बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देश के उन गिने चुने राजनेताओं में हैं, जिन पर निजी स्वार्थ के लिए आर्थिक उपार्जन करने के आरोप अब तक नहीं लगे, लेकिन यह भी सौ फीसदी सच है कि बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रतिवर्ष वसंत पंचमी के पावन अवसर जिस सेवानिवृत्त्त आईएएस अधिकारी के पटना स्थित आवास पर सरस्वती वंदना करने पहुंचते हैं, वह रिटायर्ड आईएएस अधिकारी बिहार के निकम्मे व भ्रष्ट लोक सूचना पदाधिकारियों को संरक्षण प्रदान को लेकर बतौर मुख्य राज्य सूचना आयुक्त पूरे देश में विगत कई सालों में उसी तरह कुख्यात है, जिस तरह की स्वजातियों के प्रति अपनी गहरी निष्ठा क¨ लेकर भारत में सुशासन सुप्रीमकोर्ट विख्यात है। ले सार्वजनिक सभाओं में नीतीश भारत की जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था की निरंतर तीखी आलोचना करते रहे तब, लेकिन हकीकत तो यही है कि राज्यसभा में जनता दल (यू) संसदीय दल के नेता आरसीपी सिंह समेत लोकसभा में जनता दल (यू) संसदीय दल के नेता कौशलेंद्र कुमार बिहार विधानसभा के मुख्य सचेतक श्रवण कुमार, बिहार विधान परिष्द के मुख्य सचेतक संजय कुमार सिंह, जनता दल (यू) के कार्यालय प्रमुख संजय कुमार सीएम के आप्तसचिव दिनेश राय एवं सचिव मनीष वर्मा जद (यू) सुप्रीम¨ के स्वजातीय ही हैं तथा इससे भी अधिक शर्मनाक तो यह कि बिहार के अधिकतर महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर सुशासन सुप्रीम¨ के स्वजातीय अफसरों की इन दिनों भरमार है, पर जेपी के गृह राज्य के सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर महज देश की कौन कहे अब तक विदेशों में भी मचा हाहाकार है और अभी हाल ही में यह खुलासा दुनिया के तीन सबसे बड़े विश्वविद्यालयों लंदन स्कूल ऑफ इक¨नॉमिक्स, यूनिवर्सिटी आफ कैलिफ¨र्निया तथा यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो¨ बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस के स्कॉलर गुओं जू, मैरिएन बंद्रैड एवं रॉबिन बर्गीज के भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर किये गये शोध में हुआ है।

     

    हालांकि भ्रष्टाचार के खिलाफ नीतीश सरकार की जीरो टॉलरेंस की नीति की नाकामी की चर्चा शोधार्थियों ने नहीं की है, बावजूद इसके इतना तो शीशे की तरह साफ है कि विगत साढ़े बारह सालों से राज्य प्रशासन पर जिस एक खास चौकड़ी का कब्जा है, उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ नीतीश सरकारी की जीरो टॉलरेंस की नीति की बिल्कुल भी कोई परवाह नहीं है अन्यथा इससे अधिक हास्यास्पद प्रशासनिक स्थिति और क्या हो सकती है कि गैर कानूनी क्र्त्यों में संलिप्त समस्तीपुर सदर अंचल के राजस्वकर्मियों के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई करने की अपरसमाहर्ता की लिखित मांग को नीतीश के एक करीबी आईएएस अधिकारी ने बगैर क¨ई सशक्त पड़ताल किए न सिर्फ सिरे से खारिज कर दिया अपितु अपने सीनियर आईएएस अधिकारी को प्रश्न गत मामले में इससे वाकिफ ह¨ते हुए भी गुमराह करने की कोशिश की कि बिहार में विभिन्न भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों के हत्थे चढ़े एसएस वर्मा, सुधीर कुमार, एसएम राजू के सेंथिल कुमार, डॉ. जितेंद्र गुप्ता, कंवल तनुज व दीपक आनंद सरीखे आईएएस तथा नारायण मिश्रा एवं विवेक कुमार जैसे आईपीएस अधिकारियों की फेहरिस्त लंबी होने लगी है और विगत साढ़े बारह बर्षों में बिहार राज्य एंटीकरप्शन ब्यूरो¨ द्वारा 1700 से अधिक लोकसेवको को घूस लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किये जाने के बावजूद प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले में जेपी की जन्मभूमि देश के अव्वल राज्य में शुमार हो चुका है और स्वयं एंटी करप्शन ब्यूरो ने वर्ष 2017 में खुलासा किया है कि बिहार में लोंगों ने रिश्वत मांगे जाने की सबसे अधिक शिकायतें पुलिस कर्मियों व भू राजस्व कर्मियों के खिलाफ दर्ज करायी है। निसंदेह निर्धारित दिशा-निर्देश एवं नियम कानून होने के बावजूद बड़े अधिकारी अपने विवेक से फैसले करते हैं और यह भी सच है कि इतनी गुंजाइश छोड़े बिना कोई काम हो भी नहीं सकता है, लेकिन गड़बड़ी भी वहीं से शुरू होती है, जहां अधिकारी अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं तथा विवेक परस्वार्थ हावी होता है।

    यद्यपि, बिहार की कौन कहे हम देश के तमाम प्रतिष्ठित प्रशासनिक पदाधिकारियों से ससम्मान पूछना चाहते हैं कि क्या बगैर विवेक की बिक्री किए आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करना मानव के लिए संव है? इसे विडंबना ही कहें कि बिहार में शराबबंदी के बाद पुलिस और आबकारी विभाग शराब माफियाओं के दो लाख से अधिक संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी कर चुकी है और सवा लाख से अधिक लोंगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन राज्य के किसी न किसी इलाकों से शराब की भारी खेप पकड़े जाने की खबर प्रतिदिन स्थानीय अखबारों छपी रहती है। बिहार में शराबबंदी के द¨ साल पूरे ह¨ गये, पर शराब बंदी को लेकर छिड़ी सियासी बहस का सिलसिला बदस्तूर जारी है। राज्य के उत्पाद व मद्यनिषेध मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव का दावा है कि शराबबंदी से शराबख¨री की लत में 80 प्रतिशत की कमी आयी है और बिहार की शराबबंदी पूरे देश में मॉडल बन रही है, जबकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी वर्ष 2016 के बिहारमद्य निषेध व उत्पाद (संश¨धन) विधेयक को भ्रष्ट नौकरशाहों के प्रति नीतीश की निष्ठा के प्रमाणिक दस्तावेज करार दे रहे हैं अब यहां तक कह रहे हैं कि बिहार मद्यनिषेध व उत्पाद (संश¨धन) विधेयक राज्य में भ्रष्ट पुलिसकर्मियों के लिए कमाई का सशक्त जरिया बन गया है और शराब की तस्करी ने नया अर्थतंत्र विकसित कर लिया है, जो खुलेआम शराब बिकने वाले दौर से अधिक खतरनाक और अनुत्पादक साबित हो रहा है, पर बाबू नीतीश कुमार लगातार द¨हरा रहे हैं कि शराबबंदी के सरकार के फैसले कतई भी पलटने वाले नहीं है तथा बिहार मद्य निषेध व उत्पाद (संश¨धन) विधेयक, 2016 के सशक्त कार्यान्वयन को सुनिचित करने की जिम्मेवारी पुलिसकर्मियों की है। लेकिन बिहार के विभिन्न जेलों में बंद आम पियक्कडो का आरोप है कि बिहार पुलिस के जवान से लेकर अधिकांश अधिकारी तक स्वयं शराब के शौकीन हैं, इसलिए शराब की तस्करी रोकना कतई भी पुलिसकर्मियों के बूते की बात नहीं है।

    हालांकि, सरकारी पियक्कडो के आरोपों को संज्ञान में नहीं लेती है, परंतु बिहार में तो थानेदारों तक ने खुलासा किया है कि राज्य के चूहों को भी थानों में जब्त कर रखी गयी शराब ही पसंद है, तो शराब की तस्करी को भला पुलिस कैसे रोके? चुहों पर शराब के शौकीन होने का इल्जाम उस समय जब राज्य में शराबबंदी नहीं थी, तो शराब के किसी होलसेलर अथवा रिटेलर ने नहीं लगाया था। बहरहाल, चुहों के शराब के शौकीन होने के खुलासे बिहार की प्रशासनिक प्रणाली से भरोसा डिगाने वाली कोई पहली घटना नहीं है। वर्ष 2015 के एक संवाददाता सम्मेलन में नीतीश के मौजूदा मंत्रिमंडलीय सहयोगी नंदकिशोर यादव ने यह कहकर बिहार की राजनीति में भूचाल सा ला दिया था कि सूचना का अधिकार अधिनियम के सशक्त क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के प्रति बिहार राज्य आयोग की बेरुखी की एकमात्र वजह निक्कमे नौकरशाहौं के प्रति सुशासन सुप्रीमो की गहरी निष्ठा है। जाने-माने ब्रिटिश कवि और स्कॉलर रिचर्ड गारनेट ने एक बार कहा था कि हर पर्दे की ख्वाहिश होती है कि कोई उसे बेपरदा करे, सिवाय कि पाखंड के परदे के। पाखंड का परदा व्यवस्था के चेहरे से उठे या न उठे मगर सरकारी कामकाज में पारदर्शिता की गारंटी देने वाला आरटीआई एक्ट खुद परदे के भीतर बिहार में इन दिनों दमतोड़ रहा है। सेवानिवृत आईएएस अधिकारी की निगरानी में आरटीआई एक्ट के प्रभाव को कमजोर करने की नीतीश कुमार की कवायद ले 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों का मुद्दा नहीं बना, लेकिन राज्य का हर प्रबुद्घ व्यक्ति इससे वाकिफ है कि विवेकाधिकार के दुरुपय¨ग के बड़े अधिकारियों की दुष्प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में वर्ष 2011 से पूर्व आरटीआई एक्ट बहुत हद तक कामयाब रहा, जबकि आज की तारीख में बिहार में सूचना का अधिकार अधिनियम की बदहाली का आलम यह है कि मौजूदा मुख्य राज्य सूचना आयुक्त तक लोकसूचना पदाधिकारियो के खिलाफ साक्ष्य पर आधारित शिकायतों को संज्ञान में नहीं लेते हैं,क्योंकि स्वयं सुशासन सुप्रीमों सरकार पर उठे हर सवाल में षड्यंत्र देखते हैं। मसलन, इससे कतई भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों के नेतृत्व क¨ खुशफहमी की बीमारी सबसे पहले घेरती है। उन्हें वही बताया अथवा सुनाया जाता है, जो वे सुनना चाहते हैं और यही बीमारी उन्हें अधिनायक में बदलने लगती है।

    सवाल, आलोचनाएं, विरोध ओर निगहबानी वे आईने हैं, जिनमें हर सरकार को अपना अक्स बार -बार देखना चाहिए, क्योंकि आईना तोड़ने वाले तुझे ख्याल रहे, अक्स तेरा भी बंट जाएगा कई हिस्सों में। गत 5 जून, 2018 के नीतीश कुमार के इस खुलासे से हम हतप्रभ हैं कि कुछ लोग उन्हें एलिमिनेट करना चाहते हैं, उन्हें तो सेवानिवृत्ति के बाद भी नीतीश कुमार की सरकार सबसे अधिक तवज्ज¨देती है, ओर सृजन को आपरेटिव बैंक घोटाले के गुनहगारों के खिलाफ भागलपुर के सामाजिक कार्यकर्ता संजीत के प्रमाणिक तथ्यों पर आधारित शिकायतों को संज्ञान में नहीं लेती है। यह अकाट्य है कि राजद सुप्रीमों का पूरा कुनबा किसी न किसी घोटाले में फंसा हुआ है। इडी, आईटी और सीबीआई की काला साया लालू-राबड़ी के पूरे परिवार पर मंडरा रहा है, लेकिन बगैर सीएम के भरोसेमंद आईएएस अधिकारियों के संरक्षण के लगातार ग्यारह सालों तक सरकार के विभिन्न विकास योजनाओं के पैसे सृजन महिला विकास सहयोग समिति की संस्थापिका के बैंक खाते में ट्रांसफर त¨ कतई भी संभव ही नहीं थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ बिहार सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के जिस दावे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फक्र करते हैं, उनका एक ड्रीम ल¨क शिकायत-निवारण अधिनियम ही उसकी कलई उतारता दिख रहा है और ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के दावे पर अगर यकीन करें त¨ वर्ष 2016-17 के मुकाबले 2017-18 में बिहार के सरकारी दफ्तरों में घूस देने वाले नागरिकों की तादाद में 02 फीसदी की बढ़¨तरी हुई है और निचले स्तर पर वर्ष 2017-18 में राज्य के 86 फीसदी व्यस्क नागरिको को सिर्फ व सिर्फ इसलिए सरकारी दफ्तरों में रिश्वत देनी पड़ी कि बिहार के ल¨कशिकायत निवारण पदाधिकारी आमतौर पर दस्तावेजी साक्ष्य पर आधारित शिकायतकर्ताओं के लिखित दावे को संज्ञान में नहीं लेते हैं। लोग महागठबंधन के बिखरने के बाद भी नीतीश कुमार सत्ता में है, लेकिन प्रशासनिक पारदर्शिता के विर¨धी सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों के प्रति अपनी अटूट निष्ठा की वजह से बिहार की जनता की नजरों में वह अपना सम्मान खाते जा रहे हैं ओर उनके चारों ओर सवालिया घेरे सघन होते जा रहे हैं।

    500 एवं 1000 के नोटों का वैधता को निरस्त करने के 9 नवंबर, 2016 के पीएम के फैसले को कालेधन पर करारी प्रहार करार देने वाले सीएमके मौजूदा कार्यकाल में एक सीनियर आईपीएस अधिकारी विवेक कुमार के सरकारी आवास से प्रतिबंधित नोटों की बरामदगी एक अकल्पनीय घटना है, बावजूद इसके कि नोटबंदी के पीएम के फैसले आर्थिक कम, राजनीतिक ज्यादा थे ओर इसका मूल मकसद रॉबिनहुड की तरह अपनी छवि पेश करना था। जिस तरह इंदिरा गांधी की छवि गरीबी हटाओ के नारे से एक बुलंद शासक के तौर पर बगैर गरीबी घटे ही उरी, उसी तरह धनाढ्य को बिना कोई नुकसान पहुंचाए मोदी ने अपनी छवि भ्रष्टाचार विरोधी के तौर पर प्रदर्शित करने की कोशिश गत 9 नवंबर, 2016 की ओर बीजेपी को कई राज्य के विधानसभा चुनावों में फायदा मिला, जबकि नोटबंदी के निहितार्थ समझने में नीतीश की नाकामी की बड़ी कीमत जद (यू) को जहानाबाद व जोकीहाट विधानसभा उपचुनावों में चुकानी पड़ी है। नीतीश की 9 नवंबर, 2016 के पीएम के फैसले पर प्रतिक्रिया ने पहली बार उनके अर्थशास्त्रीय ज्ञान को सवालों के घेरे में ला दिया। मुझे नहीं पता कि दूर दृष्टि रखने वाले सीएम के सलाहाकारों को भी अर्थशास्त्र के मकड़जाल की समझ है अथवा नहीं, क्योंकि स्वयं सुशासन सुप्रीम कोर्ट अंतत यह स्वीकार करने में डेढ़ साल लगे हैं कि नोटबंदी से गरीबों को कोई फायदा नहीं हुआ।

    नीतीश बाबू! जब कोई राजनीतिक पार्टी अपनी प्रगति के लिए प्राथमिकताएं बदलता है तो उसे अपनी चिंताओं के आयाम बदल लेने चाहिए। अन्यथा बेगानगी अच्छे खासे पार्टियों का लिया पांचा कर देती है। हमारे कार्यकर्ता घर-घर पहुंचने चाहिए। देश के हर बूथ पर हमारा कार्यकर्ता झंडा लेकर खड़ा रहेगा। पानी में आग लगा देने वाली इन राजनीतिक तैयारियों पर नयोछावर होने से पहले इतना तो समझना होगा कि काली कमाई ओर कालाधन में फर्क कर पाने में मौजूदा नरेंद्र दामोदर दास मोदी के नेतृत्ववाली सरकार नाकाम रही है ओर यही वजह है कि टैक्स हेवेन देशॉन में जमा भारतीयों के रुपये अब तक स्वदेश वापस नहीं लोटी है, जबकि बतौर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि सारा कालाधन बाहर है ओर उसे हम ले आएंगे तो 15-15 लाख रुपये हर भारतीय परिवारों को यूं ही मुफ्त में मिलेंगे। स्वयं हम कोई बड़े अर्थशास्त्री नहीं है, लेकिन अर्थशास्त्र के छात्र रहे हैं ओर मेरे अनुसार भारत की कुल आबादी के महज तीन फीसदी लोग ही काली कमाई के जरिए कालेधन का सृजन करते हैं ओर उसका सिर्फ दस फीसदी हिस्सा ही बाहर जाता है, जबकि नब्बे फीसदी हिस्सा देश में ही रहता है। यह जरूरी नहीं कि जो पैसा भारतीयों के देश से बाहर गया है, वह सारी रकम बैंकों में ही पड़ी है क्योंकि इंडस्ट्री व रियल एस्टेट तथा बच्चों की पढ़ाई एवं परिजनों के इलाज में भी कालेधन को खपाना सहज है।

    मशहूर अर्थशास्त्री डॉ. अमत्र्यसेन एवं जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके अरुण कुमार के इस दावे से हम सहमत हैं कि गत 70 सालों में जो पैसा देश से बाहर गया, उनमें से कितने खर्च हुए यह किसे पता है? इसके अलावा 90 टैक्स हेेवेन जगहें हैं ओर इन जगहों पर किसके पैसे किनके नाम से है, जब यही पता न हो तो आप वहां से पैसे ला कैसे ला सकते हैं? असल में यह मुद्दा मतों को आकर्षित करने के लिए उठाया गया था, इसलिए अप्रैल 2014 तक भाजपा ने इसे काफी तबज्जो दी। केंद्र में सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में काले धन पर एसआईटी का गठन किया गया, लेकिन चार साल हो गये, एसआईटी से निकला क्या है, यह आज तक हमारी कौन कहे स्वयं नीतीश बाबू तक को पता नहीं चला होगा। इस बीच एचएसबीसी, एलजीटी, पनामा, पेपर्स पैराडाइज पेपर्स जैसे कई मामलों के खुलासे हुए, पर इनमें भी कुछ नहीं हुआ। इनकम डिक्लरेशन स्कीम आई। नोटबंदी का धमाका किया गया। बेनामी प्रोपर्टी पर कानून बना। डिजीटलाइजेशन पर ज¨र दिया गया। जीएसटी लागू किया गया। लेकिन अब तक इन सबसे अपेक्षित फायदा नहीं हुआ। कालेधन की अर्थव्यवस्था से जुड़ी आम भारतियों की एक गलत धारणा को कारर्पोरेट केंद्रित राजनीति करने वालों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत मजबूती प्रदान की ओर मौटे तौर पर नकदी को कालाधन का पर्याय करार दिया, जबकि हकीकत यह है कि कालाधन का एक फीसदी ही नकदी में होता है।

    नोटबंदी के बाद 99 फीसदी नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गये ओर जीएसटी का कलेक्शन बता रहा है कि बिल के प्रति उपभोक्ताओं की दिलचस्पी घटी है। मोदी जी के शपथ ग्रहण समार¨ह की व्यता से लगा था कि घ¨टाले अब भारत में नहीं होंगे। लेकिन एक के बाद एक घोटाले अब धड़ाधड़ सामने आ रहे है और घोटाले उजागर होने में दरअसल तीन चार साल तो प्राय लगते ही हैं। ऐसे में मेरा स्पष्ट मानना है कि कालेधन की अर्थव्यवस्था पर पिछले चार सालों में कोई फर्क नहीं पड़ा है ओर आज भी काली कमाई का जरिया वैसे ही बरकरार है। हम यह कतई भी नहीं कह सकते कि 26 मई 2014 के बाद काली कमाई बढ़ी है, लेकिन 9 नवंबर, 2016 के बाद काली कमाई घटी भी नहीं है। कालेधन की अर्थव्यवस्था भारत में करीब 60 फीसदी है ओर बेशक ही इतने बड़े पैमाने पर गैर कानून काम तभी भी सकता है, जब उसमें राज्य व्यवस्था शामिल हो। कालेधन की अर्थव्यवस्था भ्रष्ट राजनेता, अफसरशाह, ओर बड़े कॉरपोरेट घराने की तिकड़ी चला रही है। जरूरत है जवाबदेही तय करने की ओर इसके लिए मूवमेंट खड़े करने होंगे। ऐसे मूवमेंट जो सस्टेन कर सकें, क्योंकि इस समस्या का शॉर्टटर्म सल्यूशन नहीं है। वैसे भी हम से अधिक नीतीश कुमार क¨ पता ह¨गा कि 1952 के बाद कम से कम चालीस समितियों ने कालेधन के किसी न किसी पक्ष का अध्ययन किया ओर लगग केंद्र की सभी सरकारों ने इस दिशा में कुछ न कुछ कानून बनाये। लेकिन इसका समाधान केवल कानून बनाने से ही नहीं निकलेगा। इसके समाधान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। परंतु जिस तरह सिर्फ राजनीतिक विरोधियों पर चुनिंदा कार्रवाई की गयी है, उससे कतई भी नहीं लगता कि कालेधन के सृजन पर अंकुश लगाने की दृढ़ इच्छाशक्ति नरेंद्र मोदी की सरकार में है ओर अगर सरकार के इरादों पर शक नहीं भी करें तो 9 नवंबर, 2016 के पीएम के निर्णय इसके सबूत हैं कि कालेधन की हकीकत की समझ उनमें नहीं है, पर इससे भी शर्मनाक सच यह है कि सुशासन सुप्रीम¨ पीएम के नासमझ फैसलों को उसी तरह प्रोत्साहित करने में लगे हैं, जिस तरह कि भाजपा की बिहार इकाई निकम्मे नौकरशाहों के प्रति सीएम की निष्ठा को संरक्षण प्रदान करने में मशगूल है। लेकिन, नीतीश बाबू! मैदां की हार जीत तो किस्मत की बात है, टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना।

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